तीन महीने में 40 फीसदी महंगी हुई चीनी, पटना में 75 रुपये किलो तक पहुंचा भाव
- केंद्र ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को दी मंजूरी, जमाखोरी रोकने के लिए भंडारण सीमा तय
- बिहार में 400 टन से अधिक चीनी रखने वाले व्यापारियों पर होगी कार्रवाई, मिलों और गोदामों की होगी जांच
पटना। देश में चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी ने आम उपभोक्ताओं की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। महज तीन महीनों के भीतर चीनी के दाम करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। इसके साथ ही गुड़, चावल और मक्के के आटे समेत कई खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। बढ़ती महंगाई और बाजार में संभावित जमाखोरी को देखते हुए केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। सरकार का कहना है कि कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतें बढ़ाने, जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बाजार में चीनी की कीमतों में आई तेजी ने खास तौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। पटना में चीनी का खुदरा भाव करीब 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की बात सामने आई है। त्योहारों और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच चीनी के बढ़ते दाम का असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में चीनी की कीमतों में इतनी तेज बढ़ोतरी कम ही देखने को मिली थी। कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने गुरुवार को बड़ा निर्णय लिया है। सरकार ने शुल्क दर कोटा व्यवस्था के तहत 3 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और बढ़ती कीमतों पर दबाव कम करना है। सरकार को उम्मीद है कि आयात बढ़ने से बाजार में आपूर्ति बेहतर होगी और उपभोक्ताओं को राहत मिल सकेगी। इसके साथ ही बड़ी मात्रा में चीनी की खपत करने वाले थोक उपभोक्ताओं के लिए भंडारण सीमा भी तय कर दी गई है। हर महीने 10 टन से अधिक चीनी की खपत करने वाले उपभोक्ता अब अपनी 15 दिनों की आवश्यकता के बराबर ही चीनी का भंडार रख सकेंगे। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य बड़े पैमाने पर चीनी जमा कर बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की संभावना को रोकना है। चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे आगामी 2026-27 चीनी सत्र को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। नया चीनी सत्र 1 अक्टूबर से शुरू होगा और अनुमान है कि शुरुआती भंडार घरेलू खपत के लिए जरूरी लगभग 50 लाख टन के स्तर से कम रह सकता है। उपलब्धता कम होने की आशंका के कारण बाजार में पहले से ही कीमतों को लेकर दबाव बढ़ने लगा है। दूसरी ओर, एथेनॉल उत्पादन में अनाज और गन्ने से जुड़े कच्चे माल के बढ़ते उपयोग का असर भी खाद्य और पशु आहार बाजार पर पड़ रहा है। पिछले वर्ष देश में करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ। इसके लिए बड़ी मात्रा में अनाज और चीनी उद्योग से जुड़े कच्चे माल का इस्तेमाल किया गया। इससे कुछ प्रकार के अनाज और अन्य सामग्री की उपलब्धता प्रभावित हुई है। कच्चे माल की कमी और बढ़ती मांग के कारण पशु आहार तथा कुक्कुट आहार की कीमतों में करीब 8 से 10 प्रतिशत तक वृद्धि बताई जा रही है। इसका असर दूध और अंडे की कीमतों पर भी पड़ रहा है। बाजार में इन वस्तुओं के दाम में करीब 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की स्थिति देखी जा रही है। पटना में चीनी का भाव 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने के बाद बिहार सरकार ने भी बाजार पर निगरानी बढ़ा दी है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित सीमा से अधिक चीनी का भंडार रखने वाले व्यापारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 400 टन से अधिक चीनी का भंडारण पाए जाने पर संबंधित व्यापारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। गन्ना उद्योग मंत्री संजय कुमार ने जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। विभाग के सचिव धर्मेन्द्र सिंह ने पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, समस्तीपुर और सीतामढ़ी के जिलाधिकारियों के साथ-साथ चीनी मिल संचालकों को भी भंडार की जांच के संबंध में निर्देश भेजे हैं। चिन्हित जिलों में वरीय उप समाहर्ता और ईख पदाधिकारी की संयुक्त टीम गठित की जाएगी। यह टीम चीनी मिलों और व्यापारियों के गोदामों का निरीक्षण कर मौके पर उपलब्ध चीनी का भौतिक सत्यापन करेगी। साथ ही चीनी मिलों से बिक्री के बाद माल को अधिकतम सात दिनों के भीतर मिल परिसर से बाहर भेजने का निर्देश दिया गया है। केंद्र सरकार के निर्देश के अनुसार 30 नवंबर 2026 तक व्यापारियों के लिए अधिकतम 400 टन चीनी की भंडारण सीमा लागू रहेगी। बिहार के चिन्हित जिलों में विशेष अभियान चलाकर यह जांच की जाएगी कि कहीं निर्धारित सीमा से अधिक चीनी का भंडारण तो नहीं किया गया है। चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र और राज्य सरकार के इन कदमों का सीधा उद्देश्य बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना और जमाखोरी के जरिए कृत्रिम महंगाई पैदा करने वालों पर रोक लगाना है। अब उपभोक्ताओं की निगाह इस बात पर टिकी है कि कच्ची चीनी के आयात, भंडारण सीमा और प्रशासनिक कार्रवाई का असर बाजार पर कितनी जल्दी दिखाई देता है और क्या आने वाले दिनों में चीनी के बढ़े हुए दाम से आम लोगों को राहत मिल पाती है।


