मर्सिडीज की चाबी से स्मार्ट मीटर के ठेके तक:- जांच का सबसे बड़ा सवाल
>>संजीव हंस पर स्मार्ट मीटर कंपनी को ठेका दिलाने के एवज में मर्सिडीज लेने का आरोप, लेकिन जिस सरकारी ठेके को कथित रिश्वत की वजह बताया गया, उसकी पूरी पड़ताल हुई या नहीं?

पटना। बिहार के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस से जुड़ा मर्सिडीज प्रकरण अब सिर्फ एक महंगी कार या कथित अवैध संपत्ति का मामला नहीं रह गया है। विशेष निगरानी इकाई (SVU) की जांच में आरोप सामने आया कि प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने वाली कंपनी को काम दिलाने के एवज में मर्सिडीज कार ली गई। यदि यह आरोप जांच में साबित होता है, तो इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सिरा कार नहीं, बल्कि वह सरकारी ठेका है जिसके बदले कथित लाभ लिया गया।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या उस ठेके की पूरी प्रक्रिया जांच के दायरे में आई?
कार की कहानी में कई कड़ियां
जांच के मुताबिक मर्सिडीज वर्ष 2023 में खरीदी गई और गुरुग्राम निवासी तरुण राघव के नाम पंजीकृत हुई। राघव को संजीव हंस के साले गुर बलतेज सिंह का मित्र बताया गया है। इससे पहले कार 2022 में झारखंड की कंपनी एसके एंड सन्स एंटरप्राइजेज के नाम खरीदी गई थी और बाद में उसका स्वामित्व बदला गया।
इससे जांच का सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि कार किसके नाम थी। सवाल यह है कि खरीद, भुगतान और स्वामित्व परिवर्तन के पीछे वास्तविक धन और लाभार्थी कौन था।
यदि कार रिश्वत थी, तो उसका स्रोत और बदले में मिला सरकारी लाभ—दोनों की कड़ी स्थापित करना जरूरी होगा।
70 लाख की घड़ियां भी जांच के घेरे में
छापेमारी के दौरान करीब 70 लाख रुपये मूल्य की 15 महंगी घड़ियां मिलने की रिपोर्ट भी सामने आई। इन्हें कॉर्पोरेट गिफ्ट बताया गया, जबकि जांच एजेंसियों ने इनके स्रोत पर सवाल उठाए।
ऐसे मामलों में ‘गिफ्ट’ अपने आप में अंतिम जवाब नहीं होता। यह देखना जरूरी होता है कि उपहार देने वाला कौन था और उस समय उसके सरकारी हित क्या थे।
यही सवाल मर्सिडीज पर भी लागू होता है।
असली सवाल स्मार्ट मीटर के ठेके का
बिहार में स्मार्ट प्रीपेड मीटर परियोजना लाखों उपभोक्ताओं और बड़े सार्वजनिक खर्च से जुड़ी है। ऐसे में अगर जांच एजेंसी के मुताबिक किसी स्मार्ट मीटर कंपनी से जुड़े ठेके के बदले मर्सिडीज दी गई, तो जांच का स्वाभाविक अगला चरण टेंडर प्रक्रिया होना चाहिए।
जांच में साफ होना चाहिए—
– टेंडर की शर्तें किसने तैयार कीं?
– कितनी कंपनियों ने बोली लगाई?
– तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन कैसे हुआ?
– अंतिम निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
– चयनित कंपनी को कितना काम और कितना भुगतान मिला?
– संबंधित अधिकारियों और कंपनी के बीच क्या संपर्क था?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि कथित निजी लाभ और सरकारी फैसले के बीच कोई वास्तविक संबंध था या नहीं।
जांच की सीमा पर सवाल
भ्रष्टाचार की जांच केवल संपत्ति और बैंक खातों तक सीमित नहीं हो सकती, खासकर तब जब आरोप किसी सरकारी ठेके के बदले लाभ लेने का हो।
ऐसे मामले में पूरी श्रृंखला देखनी होगी—
कंपनी → टेंडर → सरकारी निर्णय → भुगतान → कथित निजी लाभ।
अगर इस श्रृंखला का सरकारी निर्णय वाला हिस्सा ही जांच से बाहर रह जाए, तो तस्वीर अधूरी रहेगी।
इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि स्मार्ट मीटर कंपनी के टेंडर, वर्क ऑर्डर, भुगतान और संबंधित फाइल नोटिंग की जांच SVU या ED ने की है या नहीं।
अगर की है तो निष्कर्ष सामने आने चाहिए। अगर नहीं की है तो उसका कारण भी बताया जाना चाहिए।
सवाल आरोप सिद्ध करने का नहीं, सच तक पहुंचने का है
यह मान लेना भी गलत होगा कि मर्सिडीज का आरोप सामने आते ही स्मार्ट मीटर परियोजना में भ्रष्टाचार सिद्ध हो गया। किसी भी आरोप को प्रमाणित करने के लिए दस्तावेजी और वित्तीय साक्ष्य जरूरी हैं।
लेकिन इसका उलटा भी उतना ही महत्वपूर्ण है—किसी संभावित कड़ी की जांच किए बिना उसे खारिज भी नहीं किया जा सकता।
यदि टेंडर की पूरी जांच के बाद यह सामने आता है कि प्रक्रिया पारदर्शी थी और कार का सरकारी ठेके से कोई संबंध नहीं था, तो यही जांच संबंधित कंपनी और अधिकारियों को संदेह से बाहर निकाल सकती है।
लेकिन अगर टेंडर प्रक्रिया में असामान्य फैसले, वित्तीय लेन-देन या कारोबारी संपर्क की ऐसी कड़ियां मिलती हैं जो कथित रिश्वत से जुड़ती हैं, तो जांच का दायरा स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ेगा।
अब नजर उस फाइल पर
मर्सिडीज किसके नाम थी, यह जांच का एक हिस्सा है। असली सवाल है—वह किसके पैसे से खरीदी गई और उसके बदले किसे क्या मिला?
अगर कथित रिश्वत का संबंध स्मार्ट मीटर के ठेके से है, तो उस ठेके की फाइल ही इस मामले की सबसे अहम कड़ी बन जाती है।
इसलिए अब सवाल मर्सिडीज से आगे का है:
क्या जांच एजेंसियां स्मार्ट मीटर के टेंडर से लेकर भुगतान तक की पूरी फाइल खोलेंगी?
क्योंकि अगर कार कथित रिश्वत थी, तो उसके पीछे किसी सरकारी फैसले का लाभ होना चाहिए। और उस लाभ तक पहुंचने का रास्ता टेंडर की फाइल से होकर ही जाता है।
मर्सिडीज की चाबी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब वह सरकारी फाइल है, जिस पर संभव है कि उस चाबी की कीमत तय हुई हो।

