15,490 का डस्टबिन: आरटीआई से उठा सवाल,617 करोड़ तक पहुंचा आरोप—अब निशांत कुमार की जांच क्या खोलेगी खरीद का राज?
पटना।बिहार के सरकारी अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के लिए खरीदे गए डस्टबिन अब राज्य की सियासत का नया केंद्र बन गए हैं। एक ऐसी सरकारी खरीद, जो कागज पर अस्पतालों में मेडिकल कचरे के सुरक्षित प्रबंधन से जुड़ी सामान्य प्रक्रिया दिखाई देती है, वह अब कथित बड़े वित्तीय अनियमितता के आरोपों में बदल गई है।

विवाद की शुरुआत उस सूचना से हुई जिसमें दावा किया गया कि बिहार के अस्पतालों के लिए एक डस्टबिन की खरीद कीमत ₹15,490 प्रति यूनिट रही। इसके बाद बाजार में उपलब्ध सामान्य डस्टबिन की कीमत से इसकी तुलना की गई और सवाल उठाया गया कि सरकारी खरीद में इतनी बड़ी कीमत क्यों दी गई। यह जानकारी RTI के माध्यम से सामने आने का दावा किया गया है।
मामला बढ़ने पर विपक्षी दलों और नेताओं ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के कार्यकाल को निशाना बनाया। हालांकि, बाद में जन सुराज के प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि खरीद प्रक्रिया तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहते शुरू हुई थी और मंगल पांडेय के कार्यकाल में पूरी हुई। इसलिए उन्होंने दोनों कार्यकालों की भूमिका की जांच की मांग की।
इसी राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के बीच वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने मामले की विस्तृत जांच के आदेश दे दिए।
सबसे पहले सवाल उठा—एक डस्टबिन की कीमत 15,490 क्यों?इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित आंकड़ा है-15,490 प्रति डस्टबिन।
विपक्ष और कुछ नेताओं का दावा है कि सामान्य बाजार में इसी तरह के डस्टबिन काफी कम कीमत में उपलब्ध हैं। राजद की ओर से यह दावा किया गया कि 500 से 1,500 के आसपास मिलने वाली वस्तु को 15,490 की दर पर खरीदा गया।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग की खरीद में इस्तेमाल होने वाला उत्पाद सामान्य घरेलू कूड़ेदान है या मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के लिए निर्धारित तकनीकी मानकों वाला कंटेनर—यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बीएमएससीआईएल से जुड़ी खरीद में तकनीकी क्षमता, सामग्री, तापमान सहने की क्षमता, मेडिकल वेस्ट प्रबंधन की जरूरत, परिवहन, कर और अन्य शर्तें कीमत को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए सिर्फ बाजार में मिलने वाले सामान्य डस्टबिन से कीमत की तुलना करना अपने आप में भ्रष्टाचार साबित नहीं करता।यही वह बिंदु है जिसे सरकारी जांच को सबसे पहले स्पष्ट करना होगा।
-खुलासा कैसे हुआ?
मामला मुख्य रूप से RTI से प्राप्त खरीद संबंधी जानकारी सार्वजनिक होने के बाद चर्चा में आया।
सवाल यह था कि बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित सामान किस कीमत पर खरीदा गया।जब 15,490 प्रति डस्टबिन की कीमत सामने आई तो इसकी तुलना बाजार कीमत से की गई और सोशल मीडिया तथा राजनीतिक मंचों पर मामला तेजी से फैल गया।इसके बाद राजद ने इसे बड़े पैमाने की सरकारी खरीद में अनियमितता बताते हुए सरकार को घेरा।यहीं से “डस्टबिन घोटाला” शब्द राजनीतिक विमर्श में इस्तेमाल होना शुरू हुआ।
—617 करोड़ का आंकड़ा कहां से आया?
डस्टबिन विवाद के साथ सबसे बड़ा राजनीतिक दावा 617 करोड़ का सामने आया।
राजद की ओर से आरोप लगाया गया कि मंगल पांडेय के स्वास्थ्य मंत्री रहते करीब 617 करोड़ का डस्टबिन घोटाला हुआ।लेकिन इस आंकड़े को जांच में सिद्ध वित्तीय नुकसान मानना अभी उचित नहीं होगा।क्योंकि बाद में राजद सांसद सुधाकर सिंह ने अलग आंकड़ों के साथ मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट की व्यापक खरीद पर सवाल उठाए।उनके मुताबिक अप्रैल 2024 से अप्रैल 2026 के बीच बीएमएससीआईएल के 57 आदेशों के जरिए मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित सामग्री की खरीद में 305.53 करोड़ का भुगतान हुआ, जबकि उनके दावे के अनुसार समान सामग्री का बाजार मूल्य करीब l29.05 करोड़ था।इस हिसाब से उन्होंने 276.38 करोड़ से अधिक की कथित अनियमितता/नुकसान का आरोप लगाया।अर्थात वर्तमान सार्वजनिक बहस में कम से कम तीन आंकड़े घूम रहे हैं—
– 617 करोड़ — RJD/राजनीतिक आरोप से जुड़ा आंकड़ा
– 305.53 करोड़ — सुधाकर सिंह द्वारा बताई गई कुल खरीद/भुगतान राशि
– 276.38 करोड़ — उनके हिसाब से कथित अंतर
इन आंकड़ों को एक-दूसरे का पर्याय मानना ठीक नहीं होगा।
–सुधाकर सिंह ने कौन-कौन से सवाल उठाए?
सांसद सुधाकर सिंह ने सितंबर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मामले को एक बड़े मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट खरीद विवाद के रूप में पेश किया।
उनका दावा था कि—
1. 305.53 करोड़ की खरीद हुई
उनके अनुसार बीएमएससीआईएल द्वारा अप्रैल 2024 से अप्रैल 2026 के बीच 57 आदेशों के जरिए मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित सामान खरीदा गया।
2. बाजार मूल्य करीब 29.05 करोड़ बताया
उनके मुताबिक उन्हीं वस्तुओं की बाजार कीमत जीएसटी समेत लगभग 29.05 करोड़ बैठती है।
3. 276.38 करोड़ का अंतर
इसी आधार पर उन्होंने सरकारी खजाने को 276.38 करोड़ से अधिक नुकसान का आरोप लगाया।
4. डस्टबिन की क्षमता पर सवाल
सुधाकर सिंह ने एक डस्टबिन को पानी से भरकर उसकी क्षमता जांचने का दावा किया। उनका कहना था कि कागजों में इसकी क्षमता 75 लीटर बताई गई, लेकिन उनके परीक्षण में लगभग 60 लीटर पानी आया।
5. बैग की कीमत पर सवाल
उन्होंने दावा किया कि मेडिकल वेस्ट के लिए इस्तेमाल होने वाले बैग की बाजार कीमत और सरकारी खरीद कीमत में भी बड़ा अंतर था।
6. टेंडर की शर्तों में बदलाव
उनका आरोप था कि टेंडर में थर्ड पार्टी को शामिल करने का प्रावधान लाया गया, जिससे बिचौलियों के लिए रास्ता खुला।
7. मेडिकल वेस्ट मशीनों की कार्यक्षमता
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिन मेडिकल वेस्ट स्टेरलाइजेशन सिस्टम के लिए ये सामान खरीदे गए, उनमें से कुछ मशीनें कथित तौर पर काम नहीं कर रही थीं।
इन आरोपों की स्वतंत्र सरकारी जांच होना अभी बाकी है।
—मंगल पांडेय पर किसने क्या आरोप लगाए?
यहां आरोप लगाने वालों और आरोपों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
1. राजद ने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के कार्यकाल को इस कथित खरीद अनियमितता से जोड़ा।
पार्टी की ओर से दावा किया गया कि 500 से 1,500 के आसपास मिलने वाले डस्टबिन को 15,490 प्रति यूनिट की दर से खरीदा गया और इसे करीब 617 करोड़ के कथित घोटाले के रूप में पेश किया गया।
2. रोहिणी आचार्य ने भी सोशल मीडिया पोस्ट द्वारा 15,490 में डस्टबिन खरीद पर सवाल उठाया और मंगल पांडेय को निशाने पर लिया। उनके पोस्ट के आधार पर इस मामले ने सोशल मीडिया में काफी चर्चा हासिल की।
3. प्रशांत किशोर ने मामले को केवल मंगल पांडेय तक सीमित नहीं रखा।उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रिया तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहते शुरू हुई और मंगल पांडेय के कार्यकाल में पूरी हुई।
उनका आरोप था कि स्वास्थ्य विभाग का एक वरिष्ठ अधिकारी दोनों मंत्रियों के कार्यकाल में इस प्रक्रिया से जुड़ा रहा और उसी अधिकारी की भूमिका की जांच होनी चाहिए।
यानी पी के का आरोप राजनीतिक रूप से एक अलग दिशा में गया—मामला केवल एक पूर्व मंत्री का नहीं, बल्कि पूरी खरीद प्रक्रिया और उसमें शामिल अधिकारियों का भी है।
4.सुधाकर सिंह ने बाद में मामले को और व्यापक करते हुए ₹305.53 करोड़ की मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट खरीद और करीब ₹276.38 करोड़ के कथित अंतर का दावा किया।
उन्होंने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय की भूमिका पर भी सवाल उठाए और उच्च स्तरीय जांच की मांग की।
5.पूर्व सांसद ओमप्रकाश यादव ने भी मंगल पांडेय से इस मामले में सफाई मांगी। इसके बाद उन्हें भाजपा की ओर से कारण बताओ नोटिस दिए जाने की खबर सामने आई।
—एक दिलचस्प मोड़—क्या मामला सिर्फ मंगल पांडेय के कार्यकाल का है?यही सवाल प्रशांत किशोर ने उठाया।उनके अनुसार डस्टबिन की खरीद प्रक्रिया तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहते शुरू हुई थी और मंगल पांडेय के कार्यकाल में पूरी हुई।
इसलिए उन्होंने दोनों कार्यकालों की जांच की मांग की।
यह दावा यदि दस्तावेजों से पुष्ट होता है तो जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा—
फाइल किस तारीख को चली?
टेंडर कब निकला?
तकनीकी स्पेसिफिकेशन किसने तैयार की?
टेंडर किसने मंजूर किया?
सप्लाई आर्डर कब जारी हुआ?
दर किस स्तर पर तय हुई?
भुगतान किसने मंजूर किया?
और—
उस समय स्वास्थ्य विभाग और बीएमएससीआईएल में जिम्मेदार अधिकारी कौन थे?
यही दस्तावेज पूरी कहानी को राजनीतिक आरोप से प्रशासनिक जांच में बदल सकते हैं।
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निशांत कुमार ने जांच का आदेश क्यों दिया?
वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी के स्तर पर छोड़ने के बजाय जांच का आदेश दिया।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार बेगूसराय से मिली लिखित शिकायत के बाद स्वास्थ्य मंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के विशेष सचिव एम.एस. त्यागराजन को मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंपी।
जांच का दायरा केवल डस्टबिन तक सीमित नहीं बताया गया है, बल्कि अस्पतालों के लिए कूड़ेदान, दवा और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में कथित भ्रष्टाचार की पड़ताल तक विस्तृत किया गया है।
इसका मतलब यह है कि सरकार फिलहाल यह तय करने की स्थिति में नहीं है कि आरोप सही हैं या गलत। इसलिए दस्तावेजों, खरीद प्रक्रिया और भुगतान की जांच कराई जा रही है।
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जांच कौन कर रहा है?
प्रारंभिक विभागीय जांच की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के विशेष सचिव एम.एस. त्यागराजन को दी गई है।
डस्टबिन की खरीद बीएमएससीआईएल के माध्यम से हुई बताई जा रही है।बीएमएससीआईएल स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी सरकारी कंपनी है और उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर उसके गठन तथा कार्यक्षेत्र की जानकारी उपलब्ध है।
डस्टबिन घोटाला कहे जा रहे इस विवाद में असली मुद्दा केवल यह नहीं है कि—“₹1,500 का डस्टबिन ₹15,490 में क्यों खरीदा गया?”
असली सवाल इससे बड़ा है—
क्या ₹15,490 वास्तव में केवल डस्टबिन की कीमत थी?
यदि हां, तो इसकी तकनीकी जरूरत क्या थी?
यदि नहीं, तो ₹15,490 में कौन-कौन सी सेवाएं और सामग्री शामिल थीं?
और यदि बाजार और सरकारी कीमत में वास्तव में असामान्य अंतर था तो—
उस कीमत को मंजूरी किसने दी?यही जांच का मूल बिंदु है।

