बिहार में आमजनों के सिर पर लटकी सीलिंग की तलवार, आखिर कब आएगी सरकार की ‘मिक्स्ड लैंड यूज़’ नीति?स्पेशल रिपोर्ट..
पटना।राजधानी पटना समेत बिहार के प्रमुख शहरों में इन दिनों लाखों छोटे-बड़े दुकानदारों और व्यवसायियों की धड़कनें तेज हैं। वजह है—आवासीय क्षेत्रों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियां और सरकार की ढुलमुल नीति।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा रिहायशी (रेसिडेंशियल) इलाकों में अनधिकृत कमर्शियल गतिविधियों पर सख्ती दिखाए जाने के बाद कई राज्यों ने अपनी ‘मिक्स्ड लैंड यूज़ पॉलिसी’ में समय रहते सुधार कर लिया है। लेकिन बिहार में आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि: “आखिर बिहार सरकार आवासीय और कमर्शियल ज़ोनिंग को लेकर अपनी नई नीति कब लाएगी? क्या सरकार तब जागेगी जब हजारों व्यापारी अपनी दुकानों और आजीविका से बेघर हो जाएंगे?”
क्या है मिक्स्ड लैंड यूज़ का गणित?
बदलते दौर में दुनिया भर में ‘मिक्स्ड लैंड यूज़’ (आवासीय और व्यावसायिक का मिला-जुला उपयोग) का मॉडल अपनाया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि जिन सड़कों या इलाकों को अधिसूचित किया जाता है, वहां भू-स्वामी अपने मकान के निचले हिस्से (ग्राउंड फ्लोर) में सीमित व्यावसायिक गतिविधियां (जैसे- किराना दुकान, क्लिनिक, वकील का दफ्तर, स्टेशनरी आदि) संचालित कर सकते हैं। इसके लिए नगर निगम या विकास प्राधिकरण को तय ‘कन्वर्जन चार्ज’ देना होता है।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने अपने मास्टर प्लान में मिक्स्ड-यूज़ को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर रखा है, जिससे वहां के व्यापारियों को कानूनी संरक्षण मिलता है।
बिहार में भ्रम की स्थिति और व्यापारियों की चिंता
बिहार में स्थिति यह है कि पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और गया जैसे शहरों की अधिकांश मुख्य सड़कों और गलियों में सालों से रिहायशी मकानों में दुकानें और शोरूम चल रहे हैं।
* स्पष्ट नीति का अभाव: किस सड़क को ‘मिक्स्ड-यूज़ रोड’ घोषित किया जाएगा और किस पर व्यावसायिक गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी, इसे लेकर मास्टर प्लान और स्थानीय निकायों के नियमों में पारदर्शिता की भारी कमी है।
* सीलिंग और पेनल्टी का डर: नियम स्पष्ट न होने के कारण व्यापारियों पर हर समय नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई या भारी-भरकम जुर्माने का डर बना रहता है।
* रोजी-रोटी का संकट: स्थानीय व्यापारियों का कहना है—”यदि बिना किसी वैकल्पिक नीति या मिक्स्ड-यूज़ नोटिफिकेशन के एकाएक कार्रवाई शुरू होती है, तो राज्य में लाखों लोग रातों-रात बेरोजगार हो जाएंगे और उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी।”
सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद क्यों बढ़ी छटपटाहट?
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय क्षेत्रों में चल रहे अवैध कमर्शियल उपयोग, शोर, प्रदूषण और पार्किंग की समस्याओं पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि जोनिंग नियमों का उल्लंघन होता है, तो अधिकारियों को सीलिंग की कार्रवाई करनी होगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना है कि राज्य सरकारों को पारदर्शी मिक्स्ड-यूज़ पॉलिसी बनाकर नागरिकों को वैध तरीके से काम करने का विकल्प देना चाहिए। इसके बावजूद बिहार नगर विकास एवं आवास विभाग की ओर से मिक्स्ड लैंड यूज़ के सरलीकरण और श्रेणीबद्ध वर्गीकरण को लेकर कोई ठोस ड्राफ्ट या समय-सीमा सामने नहीं आई है।
जनता और व्यापारी संगठनों की मांग
व्यापारी संगठनों और आम जनता की सरकार से सीधी मांगें हैं:
* शीघ्र जारी हो स्पष्ट गाइडलाइन: सरकार तुरंत एक विस्तृत ‘मिक्स्ड लैंड यूज़ पॉलिसी’ की अधिसूचना जारी करे, जिसमें स्पष्ट हो कि कौन-कौन सी सड़कें मिक्स्ड-यूज़ के दायरे में आती हैं।
* कन्वर्जन चार्ज की पारदर्शी व्यवस्था: जो लोग आवासीय संपत्तियों में व्यावसायिक काम कर रहे हैं, उनसे एकमुश्त या वार्षिक कन्वर्जन फीस लेकर उन्हें वैध (नियमित) किया जाए।
* समयबद्ध राहत: जब तक नई नीति लागू नहीं होती, तब तक छोटे दुकानदारों और स्व-रोजगार में लगे लोगों पर सीलिंग या दंडात्मक कार्रवाई से राहत दी जाए।
निष्कर्ष: कब टूटेगी सरकार की नींद?
बिहार में रोजगार और व्यापार के अवसरों को बढ़ाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर नीतियों की स्पष्टता न होना व्यापारियों के आत्मविश्वास को तोड़ता है। अब देखना यह होगा कि नगर विकास विभाग और राज्य सरकार इस दिशा में तुरंत कदम उठाती है या फिर हजारों व्यापारियों के बेघर और बेरोजगार होने के बाद कोई ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा।
(विशेष रिपोर्ट – मीडिया डेस्क)

