आईजीआईएमएस में परीक्षा गड़बड़ी उजागर, एमबीबीएस सेकंड सेमेस्टर परीक्षा रद्द
- जांच समिति ने अनियमितताओं की पुष्टि की, कर्मियों और छात्रों को कारण बताओ नोटिस
- छात्रों ने रिपोर्ट पर उठाए सवाल, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर बढ़ा विवाद
पटना। राजधानी पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में एमबीबीएस पाठ्यक्रम की परीक्षा में गड़बड़ी का मामला सामने आने के बाद संस्थान प्रशासन ने बड़ा निर्णय लेते हुए द्वितीय सेमेस्टर वर्ष 2025 की परीक्षा रद्द कर दी है। संस्थान की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं की पुष्टि की है, जिसके बाद यह कार्रवाई की गई। प्रशासन ने इस मामले में सख्ती दिखाते हुए परीक्षा शाखा से जुड़े कई कर्मियों और कुछ छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही परीक्षा समिति में बड़े पैमाने पर बदलाव का निर्णय लिया गया है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके। संस्थान के अनुसार, नई व्यवस्था के तहत परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाया जाएगा। परीक्षा शाखा में फेरबदल करते हुए डॉ. अंजू सिंह, डॉ. विनोद कुमार और डॉ. सरिता मिश्रा को उप डीन (परीक्षा) का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। इसके अलावा अन्य कर्मचारियों का इस विभाग से स्थानांतरण किया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम परीक्षा व्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से उठाया गया है। हालांकि, इस पूरे मामले को लेकर छात्रों और कुछ शिक्षकों ने जांच रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि रिपोर्ट में वास्तविक दोषियों को बचाने का प्रयास किया गया है और मामले की पूरी सच्चाई सामने नहीं लाई गई। छात्रों का कहना है कि जिन लोगों पर सबसे अधिक आरोप थे, उनकी जिम्मेदारी कम करने के बजाय उन्हें और अधिक अधिकार दे दिए गए हैं, जिससे असंतोष बढ़ गया है। मामले की शुरुआत 13 मार्च को एक अज्ञात ई-मेल से हुई थी, जिसमें परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने और पैसों के लेन-देन के आरोप लगाए गए थे। इसके बाद करीब एक महीने की देरी से डॉ. ओम की अध्यक्षता में एक आंतरिक जांच समिति गठित की गई। बाद में जब यह मामला मीडिया में आया, तब एक नई तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई, जिसकी अध्यक्षता पीएसएम विभागाध्यक्ष डॉ. संजय कुमार को सौंपी गई। इस समिति में डॉ. ज्ञान भास्कर और डॉ. अश्विनी को सदस्य बनाया गया। समिति को सात कार्य दिवस के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था, लेकिन रिपोर्ट प्रस्तुत करने में एक महीने से अधिक समय लग गया। इस दौरान संस्थान में कई प्रशासनिक बदलाव हुए और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में प्रश्न पत्र लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर के लिए पांच से आठ लाख रुपये तक की सौदेबाजी की गई थी। प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिकाओं की कीमत अलग-अलग तय की गई थी। इसके अलावा परीक्षा शाखा के निगरानी कैमरों में संदिग्ध व्यक्तियों की आवाजाही के भी प्रमाण मिले हैं। प्रारंभिक जांच में उत्तर पुस्तिकाओं पर हस्ताक्षर से जुड़ी गड़बड़ियां भी सामने आई हैं, जिससे परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संस्थान के प्राचार्य को जांच प्रक्रिया से दूर रखा गया। छात्रों और कुछ शिक्षकों का आरोप है कि 13 मार्च के बाद हुई किसी भी बैठक में प्राचार्य को शामिल नहीं किया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है। इसके अलावा यह भी सामने आया है कि जांच समिति को परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे जांच की प्रक्रिया अधूरी प्रतीत होती है। इस कारण छात्रों में आक्रोश और असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। आईजीआईएमएस में परीक्षा गड़बड़ी का यह मामला न केवल संस्थान की साख पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को भी उजागर करता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है।


