August 14, 2026

बिहार में परीक्षाओं में नकल को लेकर हाईकोर्ट सख्त, कहा- यह ‘प्लेग’ से भी खतरनाक बीमारी, जल्द कदम उठाए सरकार

  • पटना हाईकोर्ट बोली- देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करेगा चीटिंग, यूनिवर्सिटी जल्द उठाए सख्त कदम
  • एमबीबीएस परीक्षा में दूसरे छात्र को बैठाने के मामले में पटना हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

पटना। परीक्षा में नकल और अनुचित साधनों के इस्तेमाल को लेकर पटना हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस हरीश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा में नकल और अनुचित साधनों का इस्तेमाल ‘प्लेग’ की तरह है। यह ऐसी महामारी है, जो समाज के साथ-साथ किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर सकती है। यदि इस प्रवृत्ति को इसी तरह छोड़ दिया गया या इसमें नरमी बरती गई तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि देश की प्रगति के लिए शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और परीक्षाओं की शुचिता बेहद महत्वपूर्ण है। मेहनत और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने वाले छात्रों के साथ उन लोगों को अनुचित लाभ देना अन्याय होगा, जो परीक्षा में नकल या दूसरे गलत तरीकों का सहारा लेते हैं।
दूसरे छात्र को परीक्षा में बैठाने का आरोप
मामला आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी से जुड़े एमबीबीएस छात्र अरविंद कुमार मेहता का है। छात्र पर आरोप है कि उसने तृतीय व्यावसायिक एमबीबीएस भाग-एक की कान, नाक एवं गला विषय की परीक्षा में अपनी जगह अब्दुल या अभिषेक कुमार नामक दूसरे व्यक्ति को बैठाया था। परीक्षा केंद्र पर मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय ने इसकी जांच कराई। विश्वविद्यालय की अनुचित साधन समिति की अनुशंसा के आधार पर छात्र का दाखिला रद्द कर उसे विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। इसी कार्रवाई को छात्र ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
छात्र की ओर से समान राहत की मांग
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वाई.वी. गिरी ने अदालत में दलील दी कि इसी तरह के एक पुराने मामले में हाईकोर्ट ने स्थायी निष्कासन की सजा को अत्यधिक कठोर और अनुपातहीन मानते हुए उसे तीन वर्ष के निष्कासन में बदल दिया था। उनका तर्क था कि जब सह-आरोपी छात्र अभिषेक कुमार और समान परिस्थिति वाले कुछ छात्रों को राहत मिल चुकी है तो अरविंद कुमार मेहता के साथ भी समान व्यवहार किया जाना चाहिए। समान परिस्थितियों में समान व्यवहार न्याय का मूल सिद्धांत है। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी अधिनियम और वर्ष 2011 की नियमावली के तहत कुलपति को अनुशासनात्मक मामलों में उचित दंड चुनने का अधिकार है। विश्वविद्यालय के अधीनस्थ नियम इस वैधानिक विवेकाधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। उनके अनुसार, कुलपति को प्रत्येक मामले के तथ्यों और छात्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए दंड तय करना चाहिए।
विश्वविद्यालय ने कहा, आरोप पूरी तरह साबित
विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.के. वर्मा ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह तथ्य विवादित नहीं है कि छात्र ने अपनी जगह दूसरे व्यक्ति को परीक्षा में बैठने दिया था। छात्र के कारण बताओ नोटिस के जवाब से भी यह तथ्य स्पष्ट होता है। उन्होंने कहा कि ऐसे में दूसरे व्यक्ति से परीक्षा दिलाने का आरोप साबित है और विश्वविद्यालय के कदाचार संबंधी नियम छात्र पर लागू होते हैं। नियम की धारा 5.1(सी) में ऐसे मामले में छात्र का दाखिला रद्द करने और उसे विश्वविद्यालय से निष्कासित करने का स्पष्ट प्रावधान है। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता के अनुसार, जांच के दौरान परीक्षा निरीक्षक, केंद्र अधीक्षक और पर्यवेक्षक की रिपोर्ट से भी आरोप की पुष्टि हुई। छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी करने के साथ व्यक्तिगत सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हुआ।
नकल को बताया गंभीर सामाजिक समस्या
विश्वविद्यालय की ओर से यह भी कहा गया कि यह केवल परीक्षा में अनुचित साधन इस्तेमाल करने का मामला नहीं है, बल्कि इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ता है। ऐसे मामलों में सहानुभूति बरतने से उन छात्रों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने मेहनत कर अपनी योग्यता साबित की है। दलील दी गई कि यदि अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वाले छात्रों को आसानी से राहत मिलती रही तो इससे परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और गलत प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा।
सरकार ने पुराने फैसले पर उठाया सवाल
राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता-2 प्रशांत प्रताप ने कहा कि याचिकाकर्ता जिस पुराने फैसले के आधार पर समान राहत मांग रहा है, उसमें हाईकोर्ट के पहले के प्रशांत भारती बनाम आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी मामले के निर्णय पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने उस फैसले को चुनौती देते हुए एलपीए संख्या 613/2026 और अन्य संबंधित अपीलें दायर की हैं। इसलिए उस फैसले को अंतिम और निर्णायक मानकर वर्तमान मामले में राहत देना उचित नहीं होगा।
दो फैसलों में मतभेद, अब खंडपीठ करेगी फैसला
इस पर याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि प्रशांत भारती का मामला अलग था। उनके अनुसार, उस मामले में वर्ष 2011 की नियमावली की धारा 27(डी) पर विचार नहीं हुआ था। इस प्रावधान के तहत कुलपति को अलग-अलग दंडों में से परिस्थितियों के अनुसार उचित दंड चुनने का अधिकार मिलता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस हरीश कुमार ने पाया कि पुराने दो फैसलों के बीच महत्वपूर्ण अंतर और मतभेद मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि भावेश कुमार भास्कर मामले में दिए गए निष्कर्ष पर आगे विचार की आवश्यकता है। साथ ही पहले के प्रशांत भारती फैसले में नियमावली की धारा 27(डी) के प्रभाव पर विचार नहीं किए जाने की बात भी सामने आई। न्यायिक अनुशासन और दोनों फैसलों के बीच मतभेद को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को खंडपीठ यानी डिवीजन बेंच के पास भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को विश्वविद्यालय की ओर से दायर एलपीए संख्या 613/2026 के साथ रखा जाए। अब छात्र को राहत मिलेगी या विश्वविद्यालय का निष्कासन आदेश कायम रहेगा, इसका फैसला खंडपीठ करेगी। इस बीच हाईकोर्ट की टिप्पणी ने परीक्षा में नकल और अनुचित साधनों के खिलाफ कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि मेहनत से योग्यता हासिल करने वाले छात्रों के हितों की कीमत पर नकल करने वालों के प्रति नरमी नहीं बरती जा सकती। परीक्षा की निष्पक्षता और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना न्याय व्यवस्था और संस्थानों दोनों के लिए अहम है।

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