August 14, 2026

बिजली बिल बकाया होना बिजली चोरी नहीं, पटना हाईकोर्ट ने रद्द की एफआईआर

  • 5.39 लाख रुपये बकाया रहने पर बिजली चोरी की धारा में दर्ज हुई थी प्राथमिकी, अदालत ने कहा- आपराधिक कार्रवाई के लिए बेईमानी की मंशा साबित करना जरूरी
  • धारा 126 में अनधिकृत बिजली उपयोग पर हो सकती है वसूली, लेकिन धारा 135 के तहत मुकदमे के लिए चोरी और बेईमान मंशा का कानूनी आधार जरूरी

पटना। पटना हाईकोर्ट ने घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल बिजली बिल का बकाया रह जाना या समय पर भुगतान नहीं करना अपने आप में बिजली चोरी का आपराधिक अपराध नहीं बनता। अदालत ने कहा कि बिजली चोरी के मामले में आपराधिक कार्रवाई के लिए उपभोक्ता की बेईमान मंशा का होना और उसका कानूनी आधार पर साबित किया जाना जरूरी है। इसी आधार पर न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने मो. शाहिद इमाम के खिलाफ बिजली कानून की धारा 135 के तहत दर्ज प्राथमिकी को निरस्त कर दिया। मामला उस समय सामने आया जब बिजली विभाग ने उपभोक्ता पर करीब 5.39 लाख रुपये के बिजली बिल के बकाये का हवाला दिया। विभाग के अनुसार बकाया राशि के कारण बिजली कनेक्शन काट दिया गया था। इसके बाद भी उपभोक्ता द्वारा कथित रूप से अनधिकृत तरीके से बिजली का इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाते हुए बिजली चोरी की धारा 135 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई। उपभोक्ता ने इस प्राथमिकी को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 135 और धारा 126 के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि दोनों प्रावधानों का उद्देश्य और कार्रवाई का स्वरूप अलग है। धारा 126 के तहत बिजली के अनधिकृत उपयोग का आकलन कर आर्थिक दायित्व तय किया जा सकता है। इसके लिए आपराधिक मंशा साबित करना आवश्यक नहीं होता। वहीं धारा 135 बिजली चोरी से संबंधित आपराधिक प्रावधान है और इसके तहत कार्रवाई के लिए चोरी के साथ बेईमान मंशा का होना भी आवश्यक तत्व है। पटना हाईकोर्ट के अनुसार धारा 126 में बेईमान मंशा की शर्त नहीं है, जबकि धारा 135 के तहत यही अंतर उसे आपराधिक चोरी के मामले में बदलता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी उपभोक्ता के ऊपर बिजली बिल की बड़ी राशि बकाया होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने बिजली चोरी की है। यदि बिजली विभाग के पास बकाया राशि है तो वह कानून के तहत उसकी वसूली की कार्रवाई कर सकता है। अनधिकृत उपयोग पाए जाने पर संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत आर्थिक दायित्व भी निर्धारित किया जा सकता है। लेकिन केवल बकाया या अनधिकृत उपयोग को आधार बनाकर आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने के लिए चोरी से जुड़ी आवश्यक परिस्थितियों को भी स्थापित करना होगा। बिजली अधिनियम की धारा 126 मुख्य रूप से अनधिकृत उपयोग की स्थिति में आकलन और आर्थिक दायित्व से जुड़ी है। इसके तहत अधिकृत अधिकारी जांच के बाद उपभोक्ता पर अतिरिक्त बिजली खपत या अनधिकृत उपयोग के आधार पर राशि निर्धारित कर सकता है। वहीं धारा 135 बिजली चोरी को अपराध के रूप में देखती है। इसलिए दोनों धाराओं के तहत होने वाली कार्रवाई को एक समान नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने निर्णय में पूर्व न्यायिक दृष्टांतों के सिद्धांतों का भी ध्यान रखा। कानून का मूल अंतर यह है कि बिजली के अनधिकृत उपयोग और बिजली चोरी के बीच आपराधिक मंशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पटना हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए मो. शाहिद इमाम के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को आगे जारी रखने का आधार नहीं पाया और उसे निरस्त कर दिया। इस फैसले का सीधा अर्थ यह है कि बिजली उपभोक्ता द्वारा बिल का भुगतान नहीं किए जाने पर बिजली विभाग वसूली की प्रक्रिया अपना सकता है। कनेक्शन काटने और बकाया राशि की वसूली के लिए कानून में अलग-अलग प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन हर ऐसे मामले को बिजली चोरी का आपराधिक मामला मानना उचित नहीं होगा। आपराधिक मुकदमे के लिए यह दिखाना होगा कि उपभोक्ता ने बिजली चोरी की और इसके पीछे बेईमानी की मंशा भी थी। फैसले के बाद बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण हो गया है। बकाया बिजली बिल एक आर्थिक दायित्व हो सकता है, जबकि बिजली चोरी एक अलग आपराधिक स्थिति है। दोनों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि उपभोक्ता बकाया बिजली बिल का भुगतान करने से मुक्त हो जाते हैं। विभाग कानून के अनुसार बकाया राशि की वसूली कर सकता है। पटना हाईकोर्ट के इस आदेश ने बिजली चोरी से जुड़े मामलों में बिजली विभाग की कार्रवाई के लिए कानूनी कसौटी को एक बार फिर स्पष्ट किया है। धारा 135 के तहत आपराधिक मामला कायम करने के लिए केवल बिल बकाया होने का तथ्य पर्याप्त नहीं होगा। विभाग को कथित चोरी और उसके पीछे मौजूद बेईमान मंशा का कानूनी आधार भी स्थापित करना होगा।

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