बिहार में कांग्रेस को ऐतिहासिक झटका: 76 साल में पहली बार विधानसभा कोटे से विधान परिषद में सूपड़ा साफ!
पटना। बिहार की सियासत से कांग्रेस के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और निराशाजनक खबर सामने आ रही है। सूबे के संसदीय इतिहास में 76 साल में पहली बार ऐसा होने जा रहा है, जब बिहार विधान परिषद (Bihar Legislative Council) में विधानसभा कोटे से कांग्रेस का एक भी सदस्य (MLC) नहीं बचेगा। वरिष्ठ कांग्रेस नेता समीर कुमार सिंह का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही पार्टी ने इस कोटे की अपनी आखिरी सीट भी गंवा दी है। इस बदलाव के बाद सदन के भीतर कांग्रेस की ताकत अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाएगी।
अब परिषद में बचेंगे सिर्फ दो MLC
समीर सिंह का कार्यकाल खत्म होने के बाद 75 सदस्यों वाली बिहार विधान परिषद में कांग्रेस के पास सिर्फ 2 सदस्य रह जाएंगे। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये दोनों सदस्य भी विधानसभा के विधायकों के वोट से चुनकर नहीं आए हैं। डॉ. मदन मोहन झा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (Teachers’ Constituency) का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजीव कुमार बेगूसराय स्थानीय प्राधिकार निर्वाचन क्षेत्र (Local Authorities’ Constituency) से चुनकर आए हैं।
क्या होता है विधानसभा कोटा?
विधान परिषद के सदस्यों का एक निश्चित हिस्सा (लगभग एक-तिहाई) राज्य के विधायकों (MLAs) द्वारा चुनकर भेजा जाता है। आजादी के बाद से आज तक बिहार विधानसभा में कांग्रेस के पास हमेशा इतने विधायक जरूर रहे कि वे अपने कोटे से किसी न किसी को MLC बना सकें। लेकिन मौजूदा संख्या बल के कारण अब इस कोटे में कांग्रेस का खाता पूरी तरह खाली हो गया है।
क्यों पैदा हुए ये हालात?
बिहार विधानसभा में कांग्रेस के पास वर्तमान में सिर्फ 19 विधायक हैं। विधान परिषद के चुनाव में विधानसभा कोटे से एक सीट जीतने के लिए औसतन 21 से 22 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट की जरूरत होती है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और वामपंथी दलों (Left Parties) के साथ गठबंधन में होने के बावजूद, सीटों के आपसी तालमेल और घटती राजनीतिक ताकत के कारण कांग्रेस अपने कोटे से किसी नेता को सदन भेजने की स्थिति में नहीं रह पाई।
कभी एकछत्र राज था, अब अस्तित्व की लड़ाई
यह आंकड़ा कांग्रेस के पुराने दौर की याद दिलाता है जब बिहार के दोनों सदनों में पार्टी का एकछत्र राज हुआ करता था। 1950 में देश का संविधान लागू होने के बाद से यह पहला मौका है जब उच्च सदन (Upper House) के सबसे महत्वपूर्ण कोटे में देश की सबसे पुरानी पार्टी का प्रतिनिधित्व ‘शून्य’ होने जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति बिहार कांग्रेस के जमीनी संगठन और घटते जनाधार की गंभीर कहानी बयां करती है।


