अमृतवर्षा विशेष: चारा घोटाला बनाम टेंडर घोटाला— कौन है बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा ‘महा-घोटाला’?

अमृतवर्षा ब्यूरो, पटना। बिहार की सियासत और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ रहा है। जब भी राज्य में बड़े घोटालों की बात होती है, तो दशकों पुराना ‘चारा घोटाला’ ज़हन में कौंध जाता है। लेकिन हाल के दिनों में ग्रामीण कार्य और जल संसाधन जैसे विभागों में सामने आए ‘टेंडर घोटाले’ ने भ्रष्टाचार के पुराने सारे रिकॉर्ड्स को चुनौती दे दी है। अब राजनैतिक गलियारों और आम जनता के बीच यह बहस छिड़ गई है कि आखिर इन दोनों में से कौन सा घोटाला बड़ा है?
अमृतवर्षा समाचार ने जब इन दोनों मामलों की बारीकी से पड़ताल की, तो तुलना के दो मुख्य पैमाने सामने आए — रकम का आकार और राजनैतिक-सामाजिक प्रभाव
खजाने की लूट: रकम के मामले में ‘टेंडर घोटाला’ आगे
यदि सिर्फ सरकारी खजाने से उड़ाई गई रकम या कुल टर्नओवर की बात की जाए, तो आधुनिक टेंडर घोटाला चारा घोटाले से कहीं आगे निकलता दिखाई देता है:
चारा घोटाला (90 का दशक) : उस दौर में यह घोटाला करीब 950 करोड़ का था हालांकि महंगाई दर) और आज की करेंसी वैल्यू के हिसाब से यह रकम बहुत बड़ी है, लेकिन कागजी आंकड़ों में यह सीमित थी।
टेंडर घोटाला (वर्तमान): रिशु श्री और अन्य कड़ियों से जुड़े वर्तमान टेंडर घोटाले में खेल हजारों करोड़ रुपये का बताया जा रहा है。 आज के समय में सरकारी प्रोजेक्ट्स के बजट ही इतने विशाल हैं कि इनमें होने वाली कमीशनखोरी, शेल कंपनियों का नेटवर्क और बेनामी संपत्तियां चारा घोटाले के कुल वॉल्यूम को आसानी से पीछे छोड़ देती हैं।
राजनैतिक भूचाल: प्रभाव के मामले में ‘चारा घोटाला’ ऐतिहासिक
भले ही टेंडर घोटाले में पैसों का लेन-देन बड़ा हो, लेकिन जब बात राज्य की सत्ता को हिलाने और सामाजिक प्रभाव की आती है, तो चारा घोटाले की बराबरी कोई नहीं कर सकता:
सत्ता का तख्तापलट: चारा घोटाले ने बिहार की पूरी राजनैतिक दिशा बदल दी थी इसके कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को कुर्सी छोड़नी पड़ी, कई बार जेल की हवा खानी पड़ी और दर्जनों रसूखदार राजनेताओं व आईएएस (IAS) अधिकारियों का करियर हमेशा के लिए खत्म हो गया यह सीधे तौर पर गरीब जनता के पशुओं के चारे और दवाइयों की चोरी थी, जिसने जनता को भावनात्मक रूप से झकझोर दिया था।
सिस्टम की अंदरूनी दीमक: इसके विपरीत, टेंडर घोटाला मुख्य रूप से सरकारी ठेकों में फिक्सिंग, फर्जी बैंक गारंटी और रसूखदारों-ठेकेदारों के एक संगठित सिंडिकेट (गठबंधन) द्वारा की जा रही कमीशनखोरी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और जांच एजेंसियां लगातार छापेमारी कर रही हैं, मोबाइल चैट खंगाले जा रहे हैं, लेकिन अभी तक इसने चारा घोटाले की तरह शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व को सीधे तौर पर उखाड़ नहीं फेंका हैं।

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