भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज
- पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने पार्टी से दिया इस्तीफा, ‘राष्ट्रवादी-तमिल दर्शन’ आधारित नए जनआंदोलन की तैयारी
- युवा मतदाताओं में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता के अगले कदम पर राजनीतिक दलों और समर्थकों की नजर
चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। शुक्रवार को उन्होंने अपना इस्तीफा भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन को सौंपा, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया। अन्नामलाई के इस निर्णय को तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार अन्नामलाई पिछले कुछ समय से अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर गंभीर मंथन कर रहे थे। बताया जा रहा है कि इस्तीफा देने से तीन दिन पहले उन्होंने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात भी की थी। इस मुलाकात के बाद ही उनके भविष्य की दिशा को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अन्नामलाई पार्टी नेतृत्व के साथ किसी टकराव की स्थिति से बचते हुए सम्मानजनक तरीके से अपनी नई राजनीतिक यात्रा शुरू करना चाहते थे।
नई राजनीतिक दिशा की तैयारी
जानकारी के अनुसार अन्नामलाई अब तमिलनाडु में ‘राष्ट्रवादी-तमिल दर्शन’ की अवधारणा पर आधारित एक सामाजिक और जनजागरण आंदोलन शुरू करने की योजना बना रहे हैं। प्रारंभिक चरण में यह आंदोलन गैर-राजनीतिक स्वरूप में कार्य करेगा, लेकिन भविष्य में जनसमर्थन और परिस्थितियों के आधार पर इसे राजनीतिक दल का रूप भी दिया जा सकता है। बताया जा रहा है कि अन्नामलाई सात जून को अपने प्रमुख समर्थकों और सहयोगियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक करेंगे। इस बैठक में आगे की रणनीति और संगठनात्मक ढांचे को लेकर चर्चा होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके अगले कदम का प्रभाव केवल भाजपा ही नहीं बल्कि तमिलनाडु की समूची राजनीति पर पड़ सकता है।
भाजपा में तेजी से उभरे थे अन्नामलाई
पूर्व भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी अन्नामलाई ने 25 अगस्त 2020 को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद उन्हें तमिलनाडु भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2021 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने अप्रैल 2025 तक संभाला। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के लिए व्यापक अभियान चलाया। उनकी ‘एन मन्न, एन मक्कल’ अर्थात ‘मेरी धरती, मेरे लोग’ यात्रा को राज्यभर में व्यापक जनसमर्थन मिला। इस यात्रा के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सीधे जनता से संवाद स्थापित किया।
युवाओं में बनाई अलग पहचान
अन्नामलाई ने स्वयं को एक युवा, ऊर्जावान और साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में स्थापित किया। सामाजिक माध्यमों पर उनकी सक्रियता और मध्यम वर्ग के बीच उनकी लोकप्रियता ने उन्हें भाजपा का प्रमुख चेहरा बना दिया। वे राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कषगम सरकार के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उनके पार्टी छोड़ने से भाजपा को युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है। पिछले चार से पांच वर्षों में तमिलनाडु में भाजपा की पहचान काफी हद तक अन्नामलाई के नेतृत्व से जुड़ी रही है।
गठबंधन और नीतिगत मतभेदों की चर्चा
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के साथ भाजपा के गठबंधन को लेकर भी अन्नामलाई पूरी तरह सहमत नहीं थे। इसके अलावा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की त्रिभाषा नीति को तत्काल लागू करने के मुद्दे पर भी उन्होंने अलग राय रखी थी। उन्होंने इस नीति को वर्तमान सत्र के बजाय वर्ष 2029-30 के शैक्षणिक सत्र से लागू करने की मांग की थी। हालांकि इन मतभेदों के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पक्ष में चुनाव प्रचार किया और संगठनात्मक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहे।
राजनीतिक भविष्य पर टिकी निगाहें
तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में भाजपा को सीमित सफलता मिली थी, जबकि अभिनेता विजय की पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। ऐसे समय में अन्नामलाई का भाजपा से अलग होना राज्य की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। फिलहाल राजनीतिक दलों, समर्थकों और विश्लेषकों की नजर उनके अगले कदम पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि उनका प्रस्तावित जनआंदोलन तमिलनाडु की राजनीति में कितना प्रभाव छोड़ पाता है और क्या वह भविष्य में किसी नए राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरता है।


