ईडी की एफआईआर बनाम स्पेशल विजिलेंस यूनिट की चार्जशीट:-रिशु श्री टेंडर कांड में कौन अधिकारी कहां गायब?
>>2 हजार करोड़ के कथित टेंडर नेटवर्क में ईडी की कार्रवाई ने खोली थी कई परतें, फिर SVU की 4,000 पन्नों की चार्जशीट में तस्वीर क्यों बदली?

पटना।(अमृतवर्षा ब्यूरो)।चर्चित रिशु श्री टेंडर प्रकरण अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ठेकेदार रिशु श्री ने कथित तौर पर सरकारी टेंडरों को कैसे प्रभावित किया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जांच की शुरुआत में सामने आए अधिकारियों और बाद में दाखिल एसभीयू की चार्जशीट में आरोपियों की सूची में कितना अंतर है?
एक तरफ प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की कार्रवाई में सरकारी अधिकारियों के ठिकानों से करोड़ों रुपये की नकदी, संपत्ति के दस्तावेज और कथित रिश्वत के बंटवारे से जुड़े कागजात मिलने की बात सामने आई। दूसरी तरफ बिहार की विशेष निगरानी इकाई यानी एसभीयू ने जून 2026 में करीब 4,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सात लोगों को आरोपी बनाया गया।
यहीं से इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने आती है—
ईडी की जांच में जिन-जिन अधिकारियों के नाम और ठिकाने सामने आए, उनमें से कितने एसभीयू की चार्जशीट तक पहुंचे? कितनों की गिरफ्तारी हुई और कितने अधिकारी जांच के अगले चरण में आरोपी नहीं बनाए गए?
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शुरुआत रिशु श्री से, लेकिन जांच पहुंची ब्यूरोक्रेसी तक
ईडी के अनुसार रिशु श्री से जुड़ी कंपनियां बिहार के विभिन्न सरकारी विभागों में ठेके और सब-कॉन्ट्रैक्ट हासिल करती थीं। इनमें जल संसाधन, स्वास्थ्य, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण, नगर विकास, बिडको, शिक्षा, भवन निर्माण और ग्रामीण कार्य विभाग जैसे विभाग शामिल थे।
जांच एजेंसी के मुताबिक आरोप यह था कि सरकारी अधिकारियों और निजी कंपनियों के बीच कथित सांठगांठ के जरिए टेंडर हासिल किए जाते थे और इसके बदले अधिकारियों को कथित तौर पर कमीशन दिया जाता था।
यानी मामला किसी एक टेंडर तक सीमित नहीं था, बल्कि जांच का फोकस कथित तौर पर एक ऐसे नेटवर्क पर था जिसमें—
ठेकेदार → कंपनी → टेंडर → अधिकारी → भुगतान → कथित कमीशन
की पूरी श्रृंखला की जांच की जा रही थी।
ईडी ने इसी मामले में मार्च 2025 में सरकारी अधिकारियों से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की और करीब ₹11.64 करोड़ नकद बरामद होने की जानकारी दी थी। साथ ही संपत्ति संबंधी दस्तावेज और कथित रिश्वत की रकम के बंटवारे से जुड़े दस्तावेज भी मिलने की बात कही गई।
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ईडी की कार्रवाई में सामने आए सात अधिकारी
मार्च 2025 की ईडी कार्रवाई इस मामले का महत्वपूर्ण मोड़ थी।
एजेंसी ने जिन अधिकारियों से जुड़े परिसरों में तलाशी ली, उनमें—
• तारिणी दास
• मुमुक्षु चौधरी
• उमेश कुमार सिंह
• अयाज अहमद
• सागर जायसवाल
• विकास झा
• साकेत कुमार
के नाम सामने आए।
ईडी की कार्रवाई का दावा था कि ये अधिकारी विभिन्न विभागों में टेंडर प्रक्रिया और बिल भुगतान से संबंधित पदों पर थे और जांच में इनकी भूमिका की पड़ताल की जा रही थी। छापेमारी में कुल करीब ₹11.64 करोड़ नकद मिलने की बात ईडी ने कही थी।
यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा हुआ—
अगर जांच में इतने अधिकारियों की भूमिका सामने आई थी, तो बाद की एसभीयू कार्रवाई में सभी नाम आरोपी क्यों नहीं बने?
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एसभीयू की एफआईआर: मामला बिहार पुलिस की जांच में
ईडी की जांच के समानांतर बिहार की स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने भी मामले में कार्रवाई शुरू की।
एसभीयू की एफआईआर में रिशु श्री के अलावा आईएएस अधिकारी संजीव हंस, संतोष कुमार, पवन कुमार और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया।
इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया और सरकारी अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल शुरू हुई।
यहां यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है कि ईडी की जांच और एसभीयू की आपराधिक जांच अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। ईडी धनशोधन और अपराध से अर्जित संपत्ति की कड़ी पर काम कर रही थी, जबकि एसभीयू ने भ्रष्टाचार और संबंधित आपराधिक धाराओं के तहत जांच की।
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संजीव हंस का नाम क्यों महत्वपूर्ण?
इस पूरे मामले में आईएएस अधिकारी संजीव हंस का नाम सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक नामों में सामने आया।
एसभीयू की जून 2026 की चार्जशीट में संजीव हंस को आरोपी बनाया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच में रिशु श्री और संजीव हंस के बीच कथित वित्तीय संबंधों तथा टेंडर से संबंधित भूमिका की पड़ताल की गई।
एक रिपोर्ट के अनुसार करीब ₹69 करोड़ की एक परियोजना की स्वीकृत लागत कथित तौर पर ₹94 करोड़ तक बढ़ने का आरोप जांच में सामने आया।
हालांकि इन आरोपों का अंतिम निर्णय अदालत में होना है।
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ईडी की कार्रवाई में करोड़ों की नकदी
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू ईडी की मार्च 2025 की छापेमारी थी।
एजेंसी के मुताबिक सरकारी अधिकारियों से जुड़े सात परिसरों की तलाशी में लगभग—
₹11.64 करोड़ नकद
बरामद हुए।
इसके अलावा संपत्ति के दस्तावेज और कथित रिश्वत राशि के बंटवारे से संबंधित कागजात भी मिले।
बाद की ईडी कार्रवाई में अन्य स्थानों से भी नकदी और डिजिटल साक्ष्य मिलने की जानकारी सामने आई। नवंबर 2025 में अहमदाबाद, सूरत, गुरुग्राम और दिल्ली से जुड़े नौ परिसरों में तलाशी के दौरान करीब ₹33 लाख नकद मिलने की बात ED ने कही।
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रिशु श्री के यहां भी करोड़ों की संपत्ति
मामले में रिशु श्री की अपनी संपत्ति की जांच भी ईडी और एसभीयू दोनों के लिए महत्वपूर्ण रही।
ईडी की कार्रवाई में रिशु श्री और उससे जुड़े लोगों की संपत्तियों की पड़ताल हुई। बाद में करीब ₹68.09 करोड़ की संपत्तियों को प्रोविजनल अटैचमेंट में लिए जाने की जानकारी सामने आई।
जांच रिकॉर्ड में लगभग ₹265.73 करोड़ के प्रोसीड्स ऑफ क्राइम अनुमान भी सामने आया।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है—
₹68.09 करोड़ = अटैच की गई संपत्ति
जबकि
₹265.73 करोड़ = जांच में अनुमानित अपराध से अर्जित आय
दोनों आंकड़े एक ही चीज नहीं हैं।
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एसभीयू की कार्रवाई में रिशु श्री की गिरफ्तारी
जांच आगे बढ़ने के बाद एसभीयू ने रिशु श्री को गिरफ्तार किया।
उसके ठिकाने की तलाशी में करीब 2.5 लाख नकद और लगभग 2 करोड़ मूल्य के आभूषण मिलने की रिपोर्ट सामने आई।
इसके बाद एसभीयू की कार्रवाई में कई अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई।
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तीन अधिकारियों की गिरफ्तारी ने बढ़ाया सवाल
जून 2026 में एसभीयू ने तीन अधिकारियों—
मुमुक्षु चौधरी
तारिणी दास
उमेश कुमार सिंह
को गिरफ्तार किया।
इन पर रिशु श्री से जुड़ी कंपनियों को सरकारी परियोजनाओं में लाभ पहुंचाने और कथित कमीशन नेटवर्क का हिस्सा होने के आरोप लगाए गए।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल ठेकेदार की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा।
लेकिन अब सवाल यह था कि—
प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई में सामने आए बाकी अधिकारियों का क्या हुआ?
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और फिर आई 4,000 पन्नों की चार्जशीट
24 जून 2026 को एसभीयू ने करीब 4,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की।
चार्जशीट में सात आरोपी बनाए गए—
1. रिशु श्री
2. आईएएस संजीव हंस
3. संतोष कुमार
4. पवन कुमार
5. मुमुक्षु चौधरी
6. तारिणी दास
7. उमेश कुमार सिंह
इस सूची को देखें तो तस्वीर काफी बदल चुकी थी।
ईडी की कार्रवाई में जिन सात सरकारी अधिकारियों से जुड़े ठिकानों पर तलाशी हुई थी, उनमें से चार नाम—अयाज अहमद, सागर जायसवाल, विकास झा और साकेत कुमार की एसभीयू वाले चार्जशीट में आरोपी के तौर पर दिखाई नहीं देते।
यह अपने आप में किसी अधिकारी की दोषसिद्धि या निर्दोषता साबित नहीं करता, लेकिन जांच के दायरे में आए नामों और चार्जशीट में शामिल नामों के बीच अंतर जरूर दिखाता है।
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आईएएस अधिकारी अभिलाषा शर्मा और योगेश कुमार सागर का मामला भी अहम
इस प्रकरण में दो अन्य आईएएस अधिकारियों—अभिलाषा शर्मा और योगेश कुमार सागर—के नाम भी जांच के दौरान सामने आए।
रिपोर्टों के अनुसार दोनों अधिकारियों के परिसरों पर एसभीयू की कार्रवाई हुई और बाद में उन्हें निलंबित भी किया गया।
लेकिन जून 2026 में दाखिल सात आरोपियों वाली चार्जशीट में दोनों के नाम आरोपी के रूप में शामिल नहीं किए गए।
उपलब्ध रिपोर्टों में यह बताया गया कि जांच एजेंसी को उस चरण में उनके खिलाफ टेंडर मैनेज करने के संबंध में पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिले थे। इसका अर्थ यह भी है कि जांच के दौरान नाम आना और चार्जशीट में आरोपी बनना दो अलग बातें हैं।
असली सवाल: ईडी की सूची छोटी कैसे होती गई?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण खोजी एंगल है।
ईडी की कार्रवाई के बाद तस्वीर कुछ और थी।
एसभीयू की जांच के बाद तस्वीर बदल गई।
और 4,000 पन्नों की चार्जशीट आने के बाद आरोपी अधिकारियों की सूची और छोटी हो गई।
इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि—
स्पेशल विजिलेंस यूनिट के द्वारा जांच के उपरांत दायर किए गए चार्ज शीट के बाद अनुत्तरित सवाल
1. ईडी ने जिन अधिकारियों के खिलाफ तलाशी ली, उनके खिलाफ एसभीयू ने क्या जांच की?
2. जिन अधिकारियों के परिसरों से कथित तौर पर नकदी या दस्तावेज मिले, उनके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई हुई?
3. किस अधिकारी को आरोपी बनाया गया और किसे नहीं?
4. जिन अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाया गया, उनके संबंध में जांच एजेंसी का निष्कर्ष क्या था?
5. क्या उन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच जारी है?
6. क्या ईडी और एसभीयू के निष्कर्षों में कोई महत्वपूर्ण अंतर है?
7. क्या कथित कमीशन की पूरी मनी ट्रेल अंतिम लाभार्थी तक पहुंची?
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“किसे बचाया गया?”—या “किसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला?”
«“ED की जांच में सामने आए अधिकारियों में से कुछ को SVU की चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया—इसके पीछे जांच एजेंसी का तर्क क्या है?”»
निष्कर्ष: 4,000 पन्नों की चार्जशीट के बाद भी खत्म नहीं होते सवाल
रिशु श्री की गिरफ्तारी और एसभीयू की 4,000 पन्नों की चार्जशीट को जांच की बड़ी कार्रवाई जरूर कहा जा सकता है।
लेकिन इस प्रकरण की पूरी तस्वीर तभी सामने आएगी जब यह स्पष्ट होगा कि—
टेंडर किसने तैयार किया?
शर्तें किसने तय कीं?
कंपनियों को पात्र किसने बनाया?
टेंडर किसने मंजूर किया?
बिल किसने पास किया?
कथित कमीशन किसके पास पहुंचा?
पैसा किन खातों में गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
“ईडी की जांच में सामने आए सभी नाम एसभीयू की चार्जशीट तक क्यों नहीं पहुंचे?”
यदि जांच एजेंसियां प्रत्येक अधिकारी के संबंध में यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दें कि किसके खिलाफ क्या साक्ष्य मिला, किसके खिलाफ क्या साक्ष्य नहीं मिला और किसे किस आधार पर आरोपी नहीं बनाया गया, तो इस पूरे मामले को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब काफी हद तक मिल सकता है।
फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड यह जरूर दिखाता है कि ईडी की जांच से एसभीयू की चार्जशीट तक आते-आते आरोपियों की सूची बदली है।

