पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बिहार सरकार और मंत्री से मांगा जवाब

  • गैर-विधायक रहते दोबारा मंत्री बनाए जाने को चुनौती, संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर टिकी निगाहें
  • दीपक प्रकाश बोले- “मैं पहले भी मंत्री था और अभी भी मंत्री हूं, अंतिम निर्णय गठबंधन नेतृत्व करेगा”

पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को लेकर नया संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब सर्वोच्च न्यायालय ने दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर बिहार सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। न्यायालय के इस कदम के बाद राज्य की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है और अब सबकी निगाहें इस मामले में आने वाले न्यायिक निर्णय पर टिकी हुई हैं। इसी बीच मंत्री दीपक प्रकाश ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह पहले भी मंत्री थे और वर्तमान समय में भी मंत्री पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि उनके भविष्य को लेकर जो भी निर्णय होगा, वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस के संबंध में पूछे जाने पर दीपक प्रकाश ने कहा कि उन्हें अभी तक आधिकारिक रूप से कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि उन्हें इस संबंध में केवल समाचार माध्यमों से जानकारी मिली है। उनका कहना था कि जब उन्हें औपचारिक रूप से नोटिस प्राप्त होगा, तब वे उसका अध्ययन कर उचित जवाब देंगे। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने उनकी सात मई 2026 को हुई पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार यदि कोई मंत्री लगातार छह माह तक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं बनता है, तो वह मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार खो देता है। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता से मौजूदा स्थिति की जानकारी मांगी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दीपक प्रकाश वर्तमान में भी बिहार सरकार में मंत्री पद पर कार्यरत हैं। इसके बाद न्यायालय ने बिहार सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनाया गया था। उस समय वह न तो विधानसभा और न ही विधान परिषद के सदस्य थे। संविधान के अनुसार किसी गैर-विधायक को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना आवश्यक होता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि दीपक प्रकाश निर्धारित अवधि के भीतर किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन सके। अनुच्छेद 164(4) के तहत उनके लिए निर्धारित छह माह की अवधि 19 मई 2026 को समाप्त हो गई थी। इसी दौरान राज्य में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मंत्रिपरिषद भंग हो गई और 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राजनीतिक बदलाव के दौरान लगभग 22 दिनों तक दीपक प्रकाश मंत्री पद पर नहीं रहे। हालांकि बाद में सात मई 2026 को उन्हें सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में फिर से पंचायती राज मंत्री के रूप में शामिल कर लिया गया। याचिका में इसी पुनर्नियुक्ति को संविधान की भावना के विपरीत बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति छह माह की अवधि के भीतर विधानमंडल का सदस्य नहीं बनता, तो उसे दोबारा मंत्री बनाकर संवैधानिक व्यवस्था को परोक्ष रूप से दरकिनार नहीं किया जा सकता। याचिका में कहा गया है कि संविधान जिस कार्य की प्रत्यक्ष अनुमति नहीं देता, उसे अप्रत्यक्ष रूप से भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या और उसकी सीमाओं को भी स्पष्ट कर सकता है। यदि न्यायालय इस मामले में कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी करता है, तो उसका प्रभाव भविष्य में अन्य राज्यों की राजनीति और मंत्रिपरिषद गठन की प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है। फिलहाल बिहार सरकार की ओर से इस मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जारी है कि यदि न्यायालय का फैसला प्रतिकूल आता है तो इसका असर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राजनीतिक रणनीति पर पड़ सकता है। अब सबकी निगाहें सर्वोच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां बिहार सरकार और मंत्री दीपक प्रकाश को अपना पक्ष रखना होगा। यह मामला आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

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