स्मार्टफोन में आधार ऐप अनिवार्य करने का प्रस्ताव वापस, कंपनियों के विरोध के बाद सरकार का फैसला

  • अब मोबाइल निर्माताओं पर प्री-इंस्टॉल करने की बाध्यता नहीं, आईटी मंत्रालय ने प्रस्ताव खारिज किया
  • सुरक्षा, संगतता और लागत को लेकर कंपनियों ने जताई थीं आपत्तियां

नई दिल्ली। स्मार्टफोन में आधार ऐप को अनिवार्य रूप से पहले से स्थापित करने के प्रस्ताव को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए इस योजना को वापस ले लिया है। अब मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों को अपने उपकरणों में आधार ऐप को पहले से स्थापित करना अनिवार्य नहीं होगा। सरकार के इस निर्णय से Apple, Samsung सहित अन्य प्रमुख कंपनियों को राहत मिली है, जिन्होंने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था। यह प्रस्ताव भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की ओर से सामने आया था, जो आधार प्रणाली का संचालन करता है। इस संस्था ने जनवरी में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से आग्रह किया था कि वह प्रमुख मोबाइल निर्माताओं जैसे Google और अन्य कंपनियों के साथ बातचीत कर आधार ऐप को अनिवार्य रूप से पहले से स्थापित करने की दिशा में पहल करे। इसका उद्देश्य यह था कि अधिक से अधिक लोगों को आधार से जुड़ी सेवाओं तक आसान पहुंच मिल सके। हालांकि, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस प्रस्ताव की समीक्षा के बाद इसे आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया। इस संबंध में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने एक बयान जारी कर कहा कि मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को अनिवार्य बनाने के पक्ष में सहमति नहीं दी है। हालांकि, इस फैसले के पीछे के कारणों को आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने यह निर्णय लेने से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से जुड़े विभिन्न पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया था। इस प्रक्रिया में कंपनियों ने कई महत्वपूर्ण चिंताएं सामने रखीं, जिनमें सुरक्षा, तकनीकी संगतता और उत्पादन लागत प्रमुख थीं। कंपनियों का कहना था कि यदि उन्हें भारत के लिए अलग से आधार ऐप के साथ स्मार्टफोन तैयार करने होंगे, तो उन्हें अलग निर्माण प्रक्रियाएं अपनानी पड़ेंगी। इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और वैश्विक बाजार के लिए बनाए जाने वाले उपकरणों से भिन्नता उत्पन्न होगी। इसके अलावा, कंपनियों ने यह भी आशंका जताई कि किसी सरकारी ऐप को अनिवार्य रूप से पहले से स्थापित करने से उपकरणों की सुरक्षा और उपयोगकर्ता की गोपनीयता से जुड़े प्रश्न खड़े हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह पहली बार नहीं था जब सरकार ने इस तरह का प्रयास किया हो। पिछले दो वर्षों में यह छठा अवसर था जब मोबाइल उपकरणों में सरकारी अनुप्रयोगों को पहले से स्थापित करने का प्रस्ताव सामने आया। हर बार कंपनियों ने इस पर आपत्ति जताई और इसे लागू करना व्यावहारिक नहीं बताया। आधार, जो एक 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या है, भारत में पहचान सत्यापन के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। यह बायोमेट्रिक जानकारी जैसे अंगुलियों के निशान और नेत्र स्कैन से जुड़ा होता है और देश के लगभग 1.34 अरब लोगों के पास यह पहचान उपलब्ध है। इसका उपयोग बैंकिंग सेवाओं, सरकारी योजनाओं और हवाई अड्डों पर त्वरित प्रवेश जैसी सुविधाओं के लिए किया जाता है। सरकार के इस फैसले को संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें एक ओर डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की कोशिश है, तो दूसरी ओर उद्योग जगत की चिंताओं को भी महत्व दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार भविष्य में ऐसे विकल्पों पर विचार कर सकती है, जिनसे उपयोगकर्ता अपनी इच्छा से आधार ऐप डाउनलोड कर सकें, बजाय इसे अनिवार्य रूप से स्थापित करने के। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार तकनीकी क्षेत्र में नीतिगत निर्णय लेते समय उद्योग और उपयोगकर्ताओं दोनों के हितों को ध्यान में रख रही है। आने वाले समय में डिजिटल पहचान और मोबाइल तकनीक के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी रहेगी।

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