नालंदा में मानव तस्करी का फैलता जाल, नौकरी और बेहतर जीवन के सपनों के नाम पर हो रहा शोषण

  • गरीब और कम पढ़ी-लिखी लड़कियां बन रहीं तस्करों का निशाना, कई क्षेत्रों तक फैला नेटवर्क
  • पिछले वर्ष 33 महिलाओं और नाबालिगों को कराया गया मुक्त, विशेषज्ञों ने जागरूकता और सख्त कार्रवाई पर दिया जोर

बिहारशरीफ। नालंदा जिले में मानव तस्करी और देह व्यापार का बढ़ता नेटवर्क प्रशासन और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। नौकरी, बेहतर जीवन, विवाह और प्रेम संबंधों के नाम पर युवतियों और नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर तस्करों के जाल में फंसाने के कई मामले हाल के वर्षों में सामने आए हैं। सामाजिक संगठनों और पुलिस की कार्रवाई में लगातार ऐसे गिरोहों का खुलासा हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या की वास्तविक स्थिति सामने आए मामलों से कहीं अधिक गंभीर हो सकती है। राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर कार्य कर रहे सामाजिक संगठनों के अनुसार जिले में आर्थिक रूप से कमजोर तथा कम शिक्षित परिवारों की लड़कियां सबसे अधिक निशाना बन रही हैं। तस्कर उन्हें रोजगार, बेहतर आय और सुरक्षित भविष्य का सपना दिखाकर अपने प्रभाव में लेते हैं। कई मामलों में प्रेम संबंधों का नाटक कर विश्वास हासिल किया जाता है और बाद में युवतियों को दूसरे जिलों या राज्यों में भेज दिया जाता है। पिछले वर्ष पुलिस और सामाजिक संस्थाओं की संयुक्त कार्रवाई में 33 महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को तस्करों के कब्जे से मुक्त कराया गया था। चालू वर्ष में भी राजगीर और सरमेरा क्षेत्र से कई पीड़ितों को बचाया गया है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल उन मामलों की संख्या है जो सामने आ सके। अनेक घटनाएं ऐसी होती हैं जो शिकायत या जांच के अभाव में कभी आधिकारिक अभिलेखों तक नहीं पहुंच पातीं। जांच एजेंसियों के अनुसार मानव तस्करी का नेटवर्क अब केवल बिहारशरीफ, राजगीर और सिलाव तक सीमित नहीं रह गया है। इसका दायरा गिरियक, पावापुरी, इस्लामपुर, रहुई, सरमेरा और आसपास के अन्य क्षेत्रों तक फैल चुका है। कई मामलों में दूसरे राज्यों की लड़कियों को जिले में लाकर होटल, भोजनालय और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में काम दिलाने के नाम पर रखा जाता है। पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि कई युवतियों और नाबालिग लड़कियों को नृत्य कार्यक्रमों और सांस्कृतिक मंडलियों में रोजगार देने का झांसा दिया जाता है। बाद में उन्हें दूसरे शहरों और राज्यों में भेजकर शोषण का शिकार बनाया जाता है। इन गतिविधियों में संगठित गिरोहों की भूमिका सामने आई है, जिनमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी सक्रिय रूप से शामिल रहती हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि तस्कर आधुनिक जीवनशैली का लालच देकर युवतियों को अपने जाल में फंसाते हैं। महंगे मोबाइल फोन, आकर्षक वस्त्र और धन का प्रलोभन देकर उनका विश्वास जीता जाता है। कई मामलों में परिवारों को भी वास्तविक स्थिति का पता तब चलता है जब लड़की काफी दूर पहुंच चुकी होती है। स्वयंसेवी संस्थाओं के अनुसार जिले में प्रतिमाह लगभग 45 से 60 नाबालिग लड़कियों के लापता होने की सूचनाएं सामने आती हैं। इनमें से कई मामलों में मानव तस्करी की आशंका व्यक्त की जाती है। सामाजिक संगठनों का दावा है कि हर महीने पांच से आठ लड़कियां तस्करों के जाल में फंस जाती हैं। कई परिवारों का आरोप है कि बहला-फुसलाकर ले जाने या अपहरण की शिकायतों को कभी-कभी केवल गुमशुदगी के रूप में दर्ज कर लिया जाता है, जिससे जांच की गति प्रभावित होती है। दिसंबर 2025 में राजगीर के कई होटलों में हुई छापेमारी ने इस नेटवर्क की गंभीरता को उजागर किया था। उस कार्रवाई में 15 महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को संदिग्ध परिस्थितियों में बरामद किया गया था। इनमें बिहार के अलावा हरियाणा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश की युवतियां भी शामिल थीं। फरवरी 2026 में सरमेरा क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम की आड़ में संचालित मानव तस्करी और देह व्यापार के नेटवर्क का भी खुलासा हुआ था। पुलिस ने वहां से 13 लड़कियों को मुक्त कराया था, जिनमें सात नाबालिग थीं। जांच में सामने आया कि उन्हें रोजगार का झांसा देकर यहां लाया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी के बाद जिले में होटल और अतिथि गृहों की संख्या बढ़ी है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर इनका दुरुपयोग अवैध गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इसलिए निगरानी और सत्यापन व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि मानव तस्करी जैसी जटिल समस्या से निपटने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाना, किशोरियों को शिक्षा से जोड़ना, परिवारों को सतर्क करना तथा रोजगार के सुरक्षित अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। उनका मानना है कि प्रशासन, समाज और परिवारों के संयुक्त प्रयास से ही इस बढ़ते खतरे पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि समय रहते कठोर और व्यापक कदम नहीं उठाए गए तो यह नेटवर्क आने वाले समय में और अधिक चुनौतीपूर्ण स्वरूप धारण कर सकता है।

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