निजी स्कूलों की किताबों पर दबाव मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त, राज्यों को नोटिस
- अभिभावकों की शिकायत पर कार्रवाई, निजी प्रकाशनों की किताबें खरीदने के दबाव पर उठे सवाल
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम और स्कूल बैग नीति के पालन पर मांगी रिपोर्ट, शिक्षा मंत्रालय से भी स्पष्टीकरण
नई दिल्ली। देशभर में निजी विद्यालयों द्वारा अभिभावकों पर महंगी और निजी प्रकाशनों की किताबें खरीदने के दबाव को लेकर उठी शिकायतों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने इस मामले में सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह कार्रवाई नमो फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत शिकायत के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कई निजी विद्यालय अभिभावकों को निर्धारित पाठ्यक्रम से इतर निजी प्रकाशनों की पुस्तकें खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं। इस मामले की सुनवाई आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। सुनवाई के दौरान आयोग ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार का दबाव अभिभावकों और विद्यार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन है। आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी राज्य सरकारें शिक्षा का अधिकार अधिनियम और राष्ट्रीय स्कूल बैग नीति के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करें। आयोग ने अपने नोटिस में राज्य सरकारों से यह भी पूछा है कि राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की उपलब्धता कितनी है और सरकारी तथा निजी विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में इन पुस्तकों की स्थिति क्या है। इसके साथ ही यह भी जानने की कोशिश की जा रही है कि जब सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों को एनसीईआरटी या राज्य परिषद की पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं, तो निजी विद्यालयों में इसी व्यवस्था को लागू करने में क्या बाधाएं हैं। आयोग ने इस बात पर विशेष चिंता जताई कि निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम को लेकर अंतर बनाया जा रहा है। आयोग के अनुसार, केवल विद्यालय के प्रबंधन के आधार पर अलग-अलग पुस्तकें और पाठ्यक्रम लागू करना अकादमिक भेदभाव की श्रेणी में आता है, जो शिक्षा के समान अवसर के सिद्धांत के विरुद्ध है। इस मामले में आयोग ने केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय को भी नोटिस जारी किया है। मंत्रालय से यह स्पष्टीकरण मांगा गया है कि कक्षा आठ तक के लिए परीक्षा बोर्डों द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम नामित शैक्षणिक प्राधिकरण से अलग क्यों है। आयोग का मानना है कि पाठ्यक्रम में इस तरह का अंतर विद्यार्थियों के हितों के विपरीत है और इससे शिक्षा व्यवस्था में असमानता बढ़ सकती है। अभिभावकों का कहना है कि निजी विद्यालय अक्सर अपनी पसंद के प्रकाशनों की किताबें अनिवार्य कर देते हैं, जिससे शिक्षा का खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है। कई मामलों में विद्यालय विशेष दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव भी बनाते हैं, जिससे अभिभावकों को आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। इस स्थिति को देखते हुए आयोग ने इसे मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे के रूप में लिया है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग के निर्देशों का प्रभावी तरीके से पालन किया गया, तो इससे शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी और अभिभावकों को राहत मिलेगी। साथ ही, सभी विद्यार्थियों के लिए समान शैक्षणिक सामग्री सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी। अब सभी राज्य सरकारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपनी होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। आयोग के इस कदम को शिक्षा व्यवस्था में सुधार और समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह मामला देश में शिक्षा के अधिकार और समान अवसर के सिद्धांत को मजबूत करने से जुड़ा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें और शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाते हैं और अभिभावकों की समस्याओं का किस प्रकार समाधान किया जाता है।


