रूसी तेल पर अमेरिकी छूट एक माह बढ़ी, भारत सहित आयातक देशों को राहत
- 16 मई 2026 तक समुद्री खेप खरीद की अनुमति, वैश्विक ऊर्जा कीमतें नियंत्रित रखने की कोशिश
- अमेरिका में फैसले की आलोचना, विशेषज्ञों ने ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता पर जताई चिंता
नई दिल्ली। अमेरिका ने रूस के तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई छूट को एक महीने के लिए बढ़ा दिया है। अमेरिकी प्रशासन ने 17 अप्रैल को वित्त मंत्रालय के माध्यम से नया विशेष लाइसेंस जारी करते हुए यह अनुमति दी है कि समुद्र में पहले से लोड रूसी कच्चे तेल की खरीद 16 मई 2026 तक जारी रह सकेगी। इस फैसले से भारत सहित कई आयातक देशों को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि उन्हें सस्ते रूसी तेल की आपूर्ति बनी रहेगी। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ ही दिन पहले संकेत दिया था कि इस तरह की छूट को आगे बढ़ाने की योजना नहीं है। बावजूद इसके, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ती कीमतों को देखते हुए प्रशासन ने अपना रुख बदलते हुए यह कदम उठाया है। इसे वैश्विक ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान और अमेरिका-इजरायल संघर्ष के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया है। ऐसे में रूसी तेल की आपूर्ति बनाए रखना जरूरी हो गया है ताकि वैश्विक बाजार में संतुलन बना रहे। इससे पहले दी गई 30 दिनों की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी, जिसे अब नए लाइसेंस के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है। हालांकि इस छूट के साथ कुछ शर्तें भी लागू की गई हैं। इसके तहत ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े किसी भी लेन-देन को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पहले कहा था कि अमेरिका रूसी और ईरानी तेल के लिए दी गई छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय बदल दिया गया। इस छूट का सबसे अधिक लाभ भारत जैसे देशों को मिलने की संभावना है, जो बड़ी मात्रा में रूसी कच्चे तेल का आयात करते हैं। मार्च 2026 में भारत ने रूस से तेल खरीद को तीन गुना बढ़ाकर लगभग 5.8 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया था। रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने पहले ही आश्वासन दिया था कि रूस भारत को आवश्यक मात्रा में तेल, रसोई गैस और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति जारी रखेगा। इस फैसले से भारतीय रिफाइनरी कंपनियों को बिना अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम के रूसी तेल खरीदने में आसानी होगी। इससे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी और ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। भारत ने हाल ही में अमेरिका से इस छूट को आगे बढ़ाने का अनुरोध भी किया था, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है। यह छूट रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगाए गए प्रतिबंधों का हिस्सा है। शुरुआत में मार्च महीने में भारत को विशेष रूप से 30 दिन की छूट दी गई थी, ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को वैश्विक बाजार में उतारा जा सके। उस समय करीब 10 करोड़ बैरल तेल बाजार में आया था, जो एक दिन के वैश्विक उत्पादन के बराबर माना जाता है। हालांकि इस फैसले को लेकर अमेरिका और यूरोप में आलोचना भी हो रही है। कुछ सांसदों का मानना है कि इस प्रकार की छूट से रूस को आर्थिक लाभ मिलेगा, जिससे वह युद्ध के लिए वित्तीय संसाधन जुटा सकेगा। यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी प्रतिबंधों में ढील देने का विरोध किया है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ ब्रेट एरिकसन का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही अस्थिर है और इस तरह की छूट आगे भी जारी रह सकती है। उनके अनुसार, मौजूदा संघर्षों ने ऊर्जा आपूर्ति शृंखला को प्रभावित किया है और बाजार को स्थिर रखने के लिए सीमित विकल्प ही बचे हैं। अमेरिकी प्रशासन का यह निर्णय तत्काल राहत देने वाला जरूर है, लेकिन इससे जुड़े राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक ऊर्जा बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है और इस प्रकार की छूट कितने समय तक जारी रहती है।


