आइएएस संजीव हंस का निलंबन राज्य सरकार ने किया खत्म, जल्द होगी तैनाती, हाईकोर्ट ने दी है जमानत
पटना। बिहार प्रशासनिक हलकों में एक अहम निर्णय सामने आया है। ऊर्जा विभाग के पूर्व प्रधान सचिव और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस को राज्य सरकार ने निलंबन से मुक्त कर दिया है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इस संबंध में आदेश जारी कर दिया गया है। निलंबन समाप्त होने के बाद अब जल्द ही उनकी नई तैनाती की प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी। इस फैसले को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि संजीव हंस पिछले एक वर्ष से अधिक समय तक निलंबन और न्यायिक प्रक्रिया के कारण सेवा से दूर रहे थे।
सामान्य प्रशासन विभाग का आदेश
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग ने संजीव हंस का निलंबन समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया है। राज्य सरकार के स्तर पर यह माना गया कि हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद निलंबन को आगे बढ़ाने का कोई ठोस आधार नहीं रह गया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि संजीव हंस की तैनाती को लेकर विचार-विमर्श शुरू हो चुका है और जल्द ही उन्हें किसी उपयुक्त विभाग में जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद योगदान
जानकारी के मुताबिक, पटना हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के बाद संजीव हंस ने अक्तूबर महीने में ही सामान्य प्रशासन विभाग में अपना योगदान दे दिया था। जमानत मिलने के बावजूद औपचारिक रूप से निलंबन समाप्त होने में कुछ समय लगा, लेकिन अब राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम फैसला ले लिया है। इससे पहले वे न्यायिक हिरासत में होने के कारण अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पा रहे थे।
मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार का मामला
संजीव हंस का नाम मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से जुड़े एक बड़े मामले में सामने आया था। प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें अक्टूबर 2024 में आय से अधिक संपत्ति और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें पटना के बेऊर जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। यह मामला खास तौर पर स्मार्ट मीटर और अन्य टेंडरों से जुड़ा बताया गया, जिसमें रिश्वत लेने और अवैध धन के लेनदेन के आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और जमानत की शर्तें
पटना हाईकोर्ट ने संजीव हंस को सशर्त जमानत दी थी। कोर्ट की शर्तों के अनुसार, वे देश छोड़कर नहीं जा सकेंगे और केस की सुनवाई के दौरान उन्हें नियमित रूप से अदालत में उपस्थित रहना होगा। उनके वकील डॉ. फारुख खान के अनुसार, अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि मामले में कई खामियां हैं। कोर्ट का मानना था कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि किसी आपराधिक गतिविधि से अर्जित धन का लेनदेन हुआ है या उस धन का उपयोग किया गया है।
हिरासत को बताया गया गैर-जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि संजीव हंस को लगातार हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत के अनुसार, जांच एजेंसी की ओर से ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे वित्तीय लेनदेन या मनी लॉन्ड्रिंग की स्पष्ट पुष्टि होती हो। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें जमानत देने का फैसला किया, जिससे उनके जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हुआ।
निजी कंपनियों से जुड़े अभियुक्तों को भी राहत
इस मामले में संजीव हंस के साथ-साथ उन निजी कंपनियों से जुड़े तीन अन्य अभियुक्तों को भी पटना हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है, जिन पर स्मार्ट मीटर समेत अन्य टेंडरों में रिश्वत देने और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप था। ये तीनों व्यक्ति करीब दस महीने से जेल में बंद थे। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब उनके भी जेल से बाहर आने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
प्रशासनिक हलकों में चर्चा
संजीव हंस का निलंबन समाप्त होने और उनकी संभावित तैनाती को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। कई अधिकारी इसे एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे सरकार के लिए एक संवेदनशील निर्णय भी बता रहे हैं। क्योंकि मामला अभी अदालत में लंबित है, ऐसे में उनकी नई जिम्मेदारी को लेकर भी सतर्कता बरती जा रही है।
तैनाती को लेकर कयास
राज्य सरकार की ओर से फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि संजीव हंस को किस विभाग में तैनात किया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि सरकार उनकी वरिष्ठता और अनुभव को देखते हुए कोई अहम जिम्मेदारी सौंप सकती है, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखा जाएगा कि लंबित मुकदमे का प्रशासनिक कामकाज पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।
आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी
हालांकि निलंबन समाप्त हो गया है और जमानत मिल चुकी है, लेकिन संजीव हंस के खिलाफ दर्ज मामला अभी अदालत में विचाराधीन है। उन्हें तय शर्तों के तहत अदालत में पेश होना होगा और कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा। आने वाले समय में अदालत के फैसले पर ही उनके मामले का अंतिम निष्कर्ष निर्भर करेगा। आईएएस संजीव हंस का निलंबन समाप्त होना और उनकी संभावित तैनाती बिहार प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। हाईकोर्ट की जमानत और सरकार के इस फैसले के बाद अब यह देखना अहम होगा कि उन्हें किस तरह की जिम्मेदारी सौंपी जाती है और लंबित कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।


