August 13, 2026

सावन में सूख रहीं बिहार की 26 नदियां, नालंदा में आठ नदियों का पाट सूखा

  • राज्य की 16 नदियों में मापी लायक पानी नहीं, 10 पूरी तरह सूखी; बारिश की कमी से खेती, पशुपालन और भूजल पर बढ़ा संकट
  • दक्षिण बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित, गया समेत कई जिलों में भूजल स्तर गिरा; दूसरी ओर नेपाल से आने वाली कोसी-गंडक जैसी नदियां उफान पर

पटना। सावन का महीना चल रहा है, लेकिन बिहार की कई नदियों की तस्वीर जल संकट की गंभीरता को सामने ला रही है। राज्य की 26 नदियां या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या उनमें इतना कम पानी बचा है कि उसकी मापी तक संभव नहीं है। सबसे खराब स्थिति दक्षिण बिहार की बताई जा रही है। नालंदा जिले में ही आठ नदियां पूरी तरह सूखी पड़ी हैं। ऐसे में बारिश का सिलसिला नहीं बढ़ा तो इन नदियों में इस वर्ष पानी लौटने को लेकर चिंता गहराती जा रही है। जल संसाधन विभाग राज्य की 81 नदियों के जलस्तर की नियमित निगरानी करता है। इसके लिए अलग-अलग स्थानों पर 117 वर्षामापी यंत्र लगाए गए हैं। बुधवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार 26 प्रभावित नदियों में 16 ऐसी हैं, जिनमें पानी मापने की सीमा से भी नीचे चला गया है। वहीं 10 नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। यह स्थिति राज्य में मानसून की कमजोर और असमय गतिविधियों का असर बताई जा रही है। जिन नदियों में पानी मापने की सीमा से नीचे है, उनमें पश्चिम चंपारण की पंडई, समस्तीपुर की नून, नून बथाने और बालान, सीतामढ़ी की लखनदेई, दरभंगा की तीषभवारा-कमला और जीवछ-कमला, अररिया की नूना, रोहतास की अवसाने और काव, औरंगाबाद की बटाने, जमुई की बरनार, नवादा की सकरी और तिलैया, मुंगेर की मुहानी तथा बांका की चिरगेरूआ नदी शामिल हैं। पटना की दरधा और कररूआ नदियों की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। नालंदा में स्थिति और गंभीर है। यहां लौकाईन, मोहाने, नोनई, पंचाने, गोइठवा, पैमार, चिरैया और भूतही नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। सावन के महीने में इन नदियों का सूखा पाट जल संकट की गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है। स्थानीय स्तर पर नदियों के सूखने का सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है। बारिश की कमी के कारण धान की रोपनी प्रभावित हुई है। जिन किसानों के खेतों तक नदियों या अन्य जल स्रोतों से पर्याप्त पानी नहीं पहुंच रहा है, उन्हें सिंचाई के लिए बिजली या डीजल चालित पंप का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है। वहीं पशुपालकों के सामने चारे और पानी की समस्या भी बढ़ रही है। हरे चारे की कमी का असर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर पड़ने की आशंका है। राज्य में अब तक सामान्य से करीब 38 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इसका असर केवल नदियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भूजल स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। गया में पिछले वर्ष की तुलना में इस बार जलस्तर और नीचे जाने की जानकारी सामने आई है। शेरघाटी, औरंगाबाद, अरवल, सासाराम, भागलपुर, बांका, पटना, आरा और बक्सर समेत कई इलाकों में भी भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। इससे आने वाले समय में पेयजल और सिंचाई की चुनौती बढ़ सकती है। इस जल संकट के बीच बिहार की तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। नेपाल से आने वाली कई नदियों में भारी पानी पहुंच रहा है। कोसी में बराह क्षेत्र में करीब 1.85 लाख घन फुट प्रति सेकंड और वीरपुर बराज में करीब 2.55 लाख घन फुट प्रति सेकंड तक पानी पहुंचा। वाल्मीकिनगर में गंडक का प्रवाह भी करीब 2.24 लाख घन फुट प्रति सेकंड तक पहुंचा। बागमती, अधवारा समूह, कोसी और गंडक का पानी राज्य के आठ स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। एक ओर स्थानीय नदियों का सूखना और दूसरी ओर नेपाल से आने वाली नदियों का उफान बिहार के जल प्रबंधन की चुनौती को स्पष्ट करता है। कम बारिश के साथ नदियों के किनारे बढ़ता अतिक्रमण, भूजल का लगातार दोहन और सिंचाई में पानी का अत्यधिक इस्तेमाल भी संकट को गंभीर बना रहे हैं। ऐसे में केवल अच्छी बारिश का इंतजार करना पर्याप्त नहीं होगा। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त कराने, वर्षाजल का संरक्षण करने, भूजल दोहन नियंत्रित करने और सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को बढ़ावा देने की जरूरत है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो सावन में सूखी नदियों की यह तस्वीर आने वाले वर्षों में बिहार के गहराते जल संकट का संकेत बन सकती है।

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