तिरहुत शिक्षक सीट पर राजेश राठौड़ की दावेदारी ने बढ़ाई दलों की बेचैनी-बदले सियासी समीकरण
मुजफ्फरपुर।(अमृतवर्षा ब्यूरो)। बिहार विधान परिषद के तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के प्रदेश मीडिया कमेटी के अध्यक्ष एवं मुख्य प्रवक्ता राजेश राठौड़ की दावेदारी ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। राजेश राठौड़ कांग्रेस के मीडिया कमेटी के अध्यक्ष है तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता भी हैं. पिछले एक दशक से महागठबंधन के सक्रिय पॉलीटिकल प्लेयर रहे हैं.ऐसे में राजेश राठौड़ की इस एमएलसी सीट के लिए की गई दावेदारी ने महागठबंधन के साथ-साथ एनडीए के घटक दलों के भी पॉलिटिकल बेचैनी को बढ़ा दिया है. करीब तीन दशक से कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में रहे राठौड़ के चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा से चुनावी समीकरण नए सिरे से बनते दिखाई दे रहे हैं।

तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर जिले शामिल हैं। इस सीट पर सामान्य विधानसभा चुनावों की तरह केवल पार्टी के चुनाव चिह्न का प्रभाव नहीं होता। शिक्षक मतदाताओं के बीच व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक संगठनों से रिश्ते और स्थानीय नेटवर्क की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहती है।
चार जिलों में व्यक्तिगत नेटवर्क पर दांव
राठौड़ के समर्थकों का दावा है कि चारों जिलों में उनका लंबे समय से व्यक्तिगत राजनीतिक संपर्क रहा है। खास बात यह है कि यह नेटवर्क केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं बताया जा रहा। विभिन्न दलों से जुड़े स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और शिक्षक प्रतिनिधियों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा है।
यदि यह नेटवर्क मतदान तक सक्रिय रहा तो मुकाबला दलीय पहचान बनाम व्यक्तिगत राजनीतिक संबंध का रूप ले सकता है।
2020 का परिणाम बना आधार
2020 के चुनाव में प्रो. संजय कुमार सिंह ने 3324 मत हासिल कर जीत दर्ज की थी। निर्दलीय भूषण कुमार झा 2015 मतों के साथ दूसरे और एनडीए समर्थित नरेंद्र प्रसाद सिंह 1404 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।
यह परिणाम बताता है कि तिरहुत शिक्षक सीट पर राजेश राठौड़ की दावेदारी के बाद उनके लिए भी पर्याप्त राजनीतिक स्पेस मौजूद है। मौजूदा सदस्य प्रो. संजय कुमार सिंह बिहार विधान परिषद के रिकॉर्ड में सीपीआई से संबद्ध दर्ज हैं।
कांग्रेस में चेयरमैन पद और उम्मीदवारी
राठौड़ की संभावित उम्मीदवारी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे फिलहाल बिहार कांग्रेस के मीडिया कमेटी के अध्यक्ष और मुख्य प्रवक्ता हैं। ऐसे में उनका चुनाव लड़ना इंडिया गठबंधन के घटक दलों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बीच एक अलग तरह की स्थिति पैदा कर सकता है।
हालांकि अंतिम तस्वीर नामांकन और आधिकारिक राजनीतिक समर्थन के बाद ही स्पष्ट होगी।
मुकाबला बहुकोणीय होने के आसार
यदि कई प्रमुख उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं तो तिरहुत शिक्षक सीट पर मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है। ऐसे चुनाव में केवल प्रथम वरीयता के वोट ही निर्णायक नहीं होते, बल्कि दूसरी और बाद की वरीयताओं की भी अहम भूमिका रहती है।
राठौड़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क को शिक्षक मतों में बदलने की होगी। नेताओं से व्यक्तिगत संबंध और शिक्षक मतदाताओं का वास्तविक समर्थन—दोनों अलग-अलग बातें हैं।
फिलहाल तिरहुत शिक्षक सीट पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या करीब तीन दशक की राजनीतिक सक्रियता और चार जिलों में बताए जा रहे व्यक्तिगत संपर्कों के दम पर राजेश राठौड़ स्थापित दलीय समीकरणों को चुनौती दे पाएंगे?
अगर वे मैदान में उतरते हैं तो यह चुनाव पार्टी बनाम व्यक्ति और संगठन बनाम व्यक्तिगत स्वीकार्यता के दिलचस्प मुकाबले में बदल सकता है।

