September 16, 2026

चर्चा : देश में जनित कुल ठोस कचरों का करीब 33 प्रतिशत का कोई लेखा जोखा नहीं मिल पाता

पटना। 16 एवं 17 जनवरी को आयोजित केन्द्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षदों-समितियों के अध्यक्षों एवं सदस्य-सचिवों के 64वें सम्मेलन के उद्घाटन के पश्चात कुल 4 तकनीकी सत्रों में विभिन्न विषयों पर चर्चा की गयी। प्रथम तकनीकी सत्र के दौरान नगरीय व प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंध्न रणनीति, द्वितीय सत्र के दौरान जीव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन पर 16 जनवरी को चर्चा संपन्न हुई जबकि आज 17 जनवरी को तीसरे सत्र के दौरान जल गुणवत्ता प्रबंधन के तहत नदियों के प्रदूषित हिस्सों के लिए एक्शन प्लान तथा अंत में चौथे सत्र के दौरान विभिन्न प्रदेशों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-समितियों से प्राप्त कार्यसूची पर चर्चा की गयी।
प्रथम तकनीकी सत्र की शुरूआत सी.पी.सी.बी. दिल्ली में शहरी प्रदूषण नियंत्राण इकाई की प्रमुख श्रीमति दिव्या सिन्हा द्वारा देश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्यान्वयन, चुनौतियों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा से प्रारंभ किया गया। उन्होंने बताया कि देश में जनित कुल ठोस कचरों का करीब 33 प्रतिशत का कोई लेखा जोखा नहीं मिल पाता है। उन्होंने डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण से लेकर अंतिम निपटान तक उठाये गये कदमों एवं इस संदर्भ में राज्यों के प्रदर्शन पर अपनी प्रस्तुति दी। उनके द्वारा ठोस कचरों के निष्पादन की चुनौतियों की चर्चा में बताया गया कि इसके लिए बुनियादी ढ़ांचे की कमी, कचरों का परिवहन, भूमि की उपलब्धता, बजटीय प्रावधन, उपकरणों के क्रय में निविदा प्रक्रिया आदि समस्यायें आती हंै। इसी क्रम में उन्होंने दमन, दीव और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों द्वारा अपनायी गयी सर्वोतम प्रथाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन के तहत किये जा रहे कार्यों की संक्षिप्त विवरणी प्रस्तुत किया। ठोस कचरो के निष्पादन हेतु केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बनाई गयी गाइडलाइन की चर्चा करते हुए उन्होंने राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षदों तथा समितियों को कचरा निष्पादन एजेन्सियों के लिए सुविध प्रदात्ता/नियामक की भूमिका निभाते हुए परस्पर बातचीत में वृद्वि करने, एजेन्सियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता निर्माण, बुनियादी अवसंरचना की स्थापना, क्षेत्रा भम्रण करते हुए चूक करने वाली एजेन्सियों पर कार्रवाई करने की आवश्यकता बतायी। श्रीमति सिन्हा द्वारा प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन पर चर्चा करते हुए बताया कि प्लास्टिक अपशिष्टों के करीब 66.55 प्रतिशत का कोई लेखा-जोखा नहीं मिल पाता है। उन्होंने विभिन्न राज्यों के प्रदर्शन का उल्लेख किया जो प्लास्टिक प्रतिबंध की स्थिति और वेबसाइट पर संबंधित प्रासंगिक विवरणों के प्रकाशन और ई.पी.आर. के लिए राष्ट्रीय ढ़ाचें की आदि से संबंधित थे। उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक को क्रमिक रूप में समाप्त किये जाने, एवं इसके विकल्पों का उपयोग बढ़ाने, अपशिष्ट प्लास्टिक के उचित प्रबंधन हेतु एक बुनियादि ढ़ांचा निर्माण, तथा नगरीय संस्थानों को ज्यादा संवेदनशील बनाने की आवश्यकता बतायी।
वहीं तमिलनाडु के अध्यक्ष ए.वी. वेक्टाचलन ने राज्य को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त बनाये जाने का समग्र चित्रण प्रस्तुत करते हुए बताया कि गत जून, 2018 को राज्य में प्लास्टिक पर प्रतिबंध की अधिसूचना जारी की गयी थी। इस अधिसूचना में ही प्लास्टिक के विकल्पों को भी सूचीबद्व कर दिया गया था।
छतीसगढ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य-सचिव द्वारा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के अम्बिकापुर मॉडल का विविध चित्राण प्रस्तुत किया गया। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के सभी पहलुओं में इस मॉडल की सफलता 100 प्रतिशत पायी गयी। डोर-टू-डोर कचरा क्लेशन से शुरू होकर अंतिम निपटान तक रू 1.25 करोड़ की आय भी अर्जित की गयी। पूरे राज्य के लिए 222 करोड़ के लक्ष्य के साथ 100 प्रतिशत की सफलता दर एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी गयी। यह पूरी तरह से महिला संचालित प्रणाली है, जिसमें रोजगार का भी सृजन हुआ। प्रभावी व बेहतर प्रबंध्न के उद्देश्य से सूखे कचरे को 156 श्रेणियों में विभाजित किया गया। उन्होंने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की वैज्ञानिक प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा की। इसके अतिरिक्त जागरूकता पैदा करने और समुदायों की भागीदारी के लिए किए गये विभिन्न बाहरी एजेन्सियों के बारे मे उल्लेख किया।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद् के अध्यक्ष को उनके राज्य पर्षद् द्वारा इस संदर्भ में उठायें गये कदम पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित करने पर डा. ए.के. घोष ने बताया कि राज्य के सभी स्वास्थ्य केन्द्रों के सूचीकरण का कार्य एक सतत प्रक्रिया के रूप में लिया गया है एवं ऐसी आशा है कि अगले 6 महीनों में पूरे राज्य में सूचीकरण का कार्य संपन्न हो जायेगा। डा. घोष ने जैविक कचरों के बेहतर निष्पादन हेतु अतिरिक्त सामूहिक जीव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन सुविधा तथा कैप्टिव अपशिष्ट प्रबंधन सुविधा स्थापित किये जाने की आवश्यक्ता बताई। डा. घोष ने जीव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन को प्रोत्साहित करने हेतु न केवल प्राधिकार शुल्क को खत्म किया गया है बल्कि तीव्र गति से प्राध्किार प्रदान करने की व्यवस्था भी की गयी है। चर्चा के दौरान तीन प्रमुख मुद्दों प्रतिरक्षा प्रणालीख् व्यावसायिक जनित जोखिम तथा सुविधा केन्द्रों द्वारा अधिक रसायनों की अधिप्राप्ति पर भी चर्चा की गयी।

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