August 11, 2026

पटना के 10 घाटों पर जापानी तकनीक से साफ होगा नालों का गंदा पानी, गंगा प्रदूषण रोकने की नई पहल

  • सीवेज शोधन संयंत्र तक पानी पहुंचाने की जरूरत होगी कम, मौके पर ही जैविक तरीके से होगा नालों के पानी का उपचार
  • एनआईटी घाट पर सफल रहा परीक्षण, बारिश के बाद गोलकपुर, आलमगंज और भद्र घाट समेत 10 प्रमुख घाटों पर लगाए जाएंगे संयंत्र

पटना। गंगा नदी को प्रदूषण से बचाने और शहर के छोटे नालों से निकलने वाले गंदे पानी को नदी में पहुंचने से पहले साफ करने के लिए बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम नई तकनीक का इस्तेमाल करने की तैयारी में है। इसके तहत छोटे नालों के पानी को दूर स्थित सीवेज शोधन संयंत्र तक पहुंचाने के बजाय नाले के मुहाने पर ही जैविक उपचार के जरिए साफ किया जाएगा। इसके लिए जापानी जैव-उपचार तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। योजना के तहत पटना के 10 प्रमुख घाटों पर इस प्रणाली को स्थापित करने की तैयारी है। इस तकनीक के माध्यम से नालों के पानी में मौजूद गंदगी और प्रदूषक तत्वों को जैविक प्रक्रिया के जरिए कम किया जाएगा। इसके बाद उपचारित पानी को गंगा में जाने दिया जाएगा। संबंधित अधिकारियों के अनुसार एक प्रणाली से करीब 10 लाख लीटर यानी एक एमएलडी पानी का उपचार किया जा सकेगा। इस पहल का उद्देश्य शहर के छोटे नालों से सीधे गंगा में पहुंचने वाले प्रदूषित पानी को रोकना और नदी के प्रदूषण स्तर को कम करने में मदद करना है। इस तकनीक का हाल ही में परियोजना ब्लू इकोसिस्टम के तहत एनआईटी घाट पर परीक्षण किया गया था। परीक्षण के दौरान नाले के पानी को मौके पर ही उपचारित करने की प्रक्रिया को आजमाया गया। अधिकारियों के अनुसार परीक्षण सफल रहा। इसके बाद अब बारिश का मौसम समाप्त होने का इंतजार किया जा रहा है। मौसम सामान्य होने के बाद पटना के चयनित घाटों पर इस प्रणाली को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की तैयारी है। योजना के शुरुआती चरण में गोलकपुर घाट, आलमगंज घाट और भद्र घाट समेत पटना के 10 प्रमुख घाटों को शामिल किया गया है। इन स्थानों पर ऐसे छोटे नालों की पहचान की गई है, जिनका पानी गंगा में पहुंचता है। नालों के मुहाने पर उपचार प्रणाली लगाने से प्रदूषित पानी को नदी में पहुंचने से पहले ही साफ किया जा सकेगा। इससे बड़े सीवेज शोधन संयंत्रों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। शहर के छोटे नालों के पानी को पारंपरिक तरीके से सीवेज शोधन संयंत्र तक ले जाना कई इलाकों में चुनौतीपूर्ण होता है। इसके लिए अलग से पाइपलाइन, पंपिंग व्यवस्था और अन्य आधारभूत संरचना की आवश्यकता पड़ती है। इससे परियोजना की लागत भी बढ़ जाती है। ऐसे में नाले के मुहाने पर ही पानी का उपचार करने वाली व्यवस्था को अपेक्षाकृत सरल और कम लागत वाला विकल्प माना जा रहा है।अधिकारियों के अनुसार एक प्रणाली स्थापित करने पर करीब दो से ढाई लाख रुपये खर्च आने का अनुमान है। इसके मुकाबले पारंपरिक नाला उपचार मशीनों और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं की लागत अधिक हो सकती है। कम लागत में छोटे नालों के प्रदूषण को नियंत्रित करने की क्षमता के कारण इस मॉडल को पटना जैसे बड़े शहर के लिए उपयोगी माना जा रहा है। जैव-उपचार तकनीक में पानी में मौजूद प्रदूषक तत्वों को कम करने के लिए जैविक प्रक्रिया का सहारा लिया जाता है। इसका उद्देश्य पानी की गुणवत्ता में सुधार करना होता है, ताकि उपचार के बाद उसमें प्रदूषणकारी तत्वों का प्रभाव कम हो सके। हालांकि, इस व्यवस्था की प्रभावशीलता लंबे समय तक बनाए रखने के लिए नियमित निगरानी और रखरखाव भी जरूरी होगा। पटना में गंगा प्रदूषण नियंत्रण के लिए पहले से ही कई योजनाओं पर काम चल रहा है। बड़े नालों के पानी को शोधन संयंत्रों तक पहुंचाकर साफ करने की व्यवस्था की जा रही है। इसके बावजूद शहर के छोटे नाले चुनौती बने हुए हैं। ऐसे नालों का पानी कई जगह सीधे नदी तक पहुंच जाता है। नई तकनीक के जरिए इसी समस्या को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद 10 प्रमुख घाटों पर प्रणाली स्थापित किए जाने की तैयारी है। यदि यह प्रयोग बड़े स्तर पर सफल रहता है तो भविष्य में पटना के अन्य छोटे नालों पर भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे कम लागत में नालों के प्रदूषित पानी का उपचार करने और गंगा में जाने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में मदद मिलने की उम्मीद है।

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