बिग ब्रेकिंग: कंपनी का फंसा हुआ 124 करोड़ और 22 इंजीनियरों का तबादला, महाघोटाले के मास्टरमाइंड रिशु श्री के कारनामें, शर्मसार हो रहा बिहार
अमृतवर्षा ब्यूरो, पटना। बिहार के महाघोटाले के मास्टरमाइंड रिशु श्री के कारनामों की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, ब्यूरोक्रेसी और सियासत का गठजोड़ पूरी तरह नंगा होता जा रहा है। जांच में अब जो सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मसार करने के लिए काफी है। रिशु श्री सिर्फ टेंडर मैनेज नहीं करता था, बल्कि वह अपनी मर्जी से सरकार के विभागों में अफसरों और इंजीनियरों की ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग’ की पूरी स्क्रिप्ट लिखता था। अपनी कंपनी का फंसा हुआ 124 करोड़ का भुगतान कराने के लिए उसने एक साथ 22 इंजीनियरों का तबादला करवा दिया था।
अधूरा काम और 124 करोड़ का पेंच: ऐसे शुरू हुआ खेल
दरअसल, जल संसाधन विभाग ने सूबे के नगर निकायों में ‘हर घर नल का जल’ योजना का करीब ₹124 करोड़ का भारी-भरकम टेंडर रिशु श्री और उससे जुड़ी कंपनियों को दिया था। मुनाफा कमाने की होड़ में जमीन पर काम पूरा नहीं किया गया, जिसके बाद नगर निकायों के ईमानदार इंजीनियरों ने रिशु की कंपनियों का फाइनल बिल पास करने से साफ मना कर दिया। बिल रुकते ही रिशु श्री के साम्राज्य में खलबली मच गई। इसके बाद जो हुआ, वह बताता है कि रिशु के पास सिर्फ ‘3% की चाबी’ नहीं थी, बल्कि सत्ता के गलियारे का रिमोट कंट्रोल भी था।
तीन महीने के लिए ट्रांसफर-पोस्टिंग और काम तमाम
रिशु ने शीर्ष अधिकारियों और रसूखदार नेताओं से साठगांठ की और एक सोची-समझी साजिश के तहत जल संसाधन विभाग के 22 जूनियर इंजीनियर (JE) और असिस्टेंट इंजीनियरों का तबादला रातों-रात नगर विकास विभाग में करवा दिया।
क्राइम की क्रोनोलॉजी समझिए
इन 22 चहेते इंजीनियरों को ठीक उन्हीं नगर निकायों में तैनात किया गया, जहां रिशु श्री का करोड़ों का बिल अटका पड़ा था। ये इंजीनियर वहां सिर्फ तीन महीने के लिए ‘विशेष मिशन’ पर रहे। अधूरी योजनाओं के बावजूद इन्होंने फाइलों पर हस्ताक्षर किए, रिशु के पेंडिंग बिल को हरी झंडी दिखाई और जैसे ही करोड़ों का भुगतान रिशु के खातों में ट्रांसफर हुआ, इन सभी 22 इंजीनियरों की वापस जल संसाधन विभाग में ‘घर वापसी’ करा दी गई।
संपादकीय दृष्टिकोण: ट्रांसफर-पोस्टिंग उद्योग और जनता का पैसा: बन बिहारी
जल संसाधन विभाग के 22 इंजीनियरों का नगर विकास विभाग में जाना, रिशु का बिल पास करना और फिर वापस अपने मूल विभाग में लौट आना—यह कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि बिहार में ‘तबादला’ एक संगठित उद्योग बन चुका है, जिसका संचालन सचिवालय के बंद कमरों से नहीं, बल्कि रिशु श्री जैसे ठेकेदारों के इशारों पर होता था। चाणक्य ने कहा था कि राजकोष की चोरी करने वाले कभी छुप नहीं सकते। आज एसवीयू की गिरफ्त में आए दो आईएएस अफसर और रडार पर चल रहे दर्जनों इंजीनियर इस बात की गवाही दे रहे हैं। लेकिन असली सवाल अब भी वही है—ये 22 फाइलें और इतने बड़े स्तर पर तबादले की फाइल बिना किसी ‘रसूखदार राजनेता’ के हस्ताक्षर के आगे बढ़ ही नहीं सकती थी। क्या जांच की आंच उस अंतिम ‘हस्ताक्षर’ तक पहुंचेगी, या छोटे प्यादों को मोहरा बनाकर खेल खत्म कर दिया जाएगा? अमृतवर्षा इस महाघोटाले के हर एक चेहरे को बेनकाब करने तक अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।


