रेपो दर में कोई बदलाव नहीं, ऋणधारकों को राहत; आर्थिक विकास दर के अनुमान में कटौती
- भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी, मासिक किस्तों पर नहीं पड़ेगा अतिरिक्त बोझ
- वैश्विक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और कमजोर मानसून की आशंका से विकास दर अनुमान घटाकर 6.6 प्रतिशत किया गया
नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ने नए वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को यथावत रखने का निर्णय लिया है। केंद्रीय बैंक ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, जिससे गृह ऋण, वाहन ऋण और अन्य खुदरा ऋणों की मासिक किस्तों में फिलहाल किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होगी। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद इस निर्णय की जानकारी दी। रिजर्व बैंक के इस फैसले को आम उपभोक्ताओं, उद्योग जगत और वित्तीय बाजारों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए ब्याज दरों में स्थिरता बनाए रखना अर्थव्यवस्था के लिए संतुलित कदम है। इससे एक ओर महंगाई पर नियंत्रण रखने में सहायता मिलेगी, वहीं दूसरी ओर निवेश और उपभोग गतिविधियों को भी समर्थन मिलता रहेगा। मौद्रिक नीति समिति ने अपनी समीक्षा के दौरान आर्थिक विकास की संभावनाओं और महंगाई की स्थिति पर विस्तार से विचार किया। हालांकि समिति ने रेपो दर में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास दर के अनुमान में कटौती कर दी है। पहले जहां विकास दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान था, वहीं अब इसे घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। रिजर्व बैंक के अनुसार पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उत्पन्न बाधाओं का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा और ईंधन की कीमतों में संभावित वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ने और महंगाई पर दबाव बनने की आशंका है। इसी कारण विकास दर के अनुमान में संशोधन किया गया है। मौद्रिक नीति समिति ने अपनी नीति का रुख भी तटस्थ बनाए रखा है। इसका अर्थ यह है कि समिति भविष्य में आर्थिक आंकड़ों और परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहेगी। समिति का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है ताकि आर्थिक विकास और मूल्य स्थिरता दोनों को समान महत्व दिया जा सके। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि खुदरा महंगाई फिलहाल निर्धारित लक्ष्य सीमा के भीतर बनी हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि वैश्विक स्तर पर ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में अधिक वृद्धि होती है तो इसका प्रभाव घरेलू बाजारों और आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। बैठक में मानसून की स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। कमजोर या सामान्य से कम वर्षा का असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार द्वारा कृषि विविधीकरण और अन्य योजनाओं के माध्यम से संभावित प्रभाव को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, इसलिए मानसून की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्र सकारात्मक संकेत भी दे रहे हैं। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन संतोषजनक बना हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में सुधार तथा रोजगार की स्थिर स्थिति के कारण शहरी क्षेत्रों में उपभोग गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। इससे आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार रेपो दर वह ब्याज दर होती है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। जब यह दर घटती है तो बैंकों को सस्ता ऋण मिलता है और वे ग्राहकों को भी कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं। इसके विपरीत रेपो दर बढ़ने पर ऋण महंगे हो जाते हैं और बाजार में धन का प्रवाह कम हो जाता है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में रेपो दर को स्थिर रखना एक संतुलित निर्णय है। इससे ऋण लेने वालों को राहत मिलेगी, जबकि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। अब निवेशकों, उद्योग जगत और आम नागरिकों की निगाहें रिजर्व बैंक की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पर टिकी रहेंगी, जहां वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों के आधार पर आगे की दिशा तय की जाएगी।


