राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल के ठिकानों पर ईडी की छापेमारी, सियासी बयानबाजी तेज
- विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून के तहत कार्रवाई, जालंधर और फगवाड़ा समेत कई स्थानों पर जांच
- आम आदमी पार्टी ने केंद्र पर साधा निशाना, चुनावी तैयारी से जोड़ा मामला
नई दिल्ली/चंडीगढ़। ईडी ने आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल के आवास और उनके कारोबारी प्रतिष्ठानों पर छापेमारी की कार्रवाई की है। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है और इसे लेकर सत्तारूढ़ दल तथा विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून के तहत की जा रही है। जांच एजेंसी ने मित्तल से जुड़े कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की, जिनमें पंजाब के जालंधर और फगवाड़ा स्थित परिसर भी शामिल हैं। बताया जा रहा है कि यह जांच उनके कारोबारी लेन-देन और वित्तीय गतिविधियों से संबंधित है। अशोक मित्तल की पहचान एक शिक्षाविद् और उद्योगपति के रूप में भी रही है। वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक हैं और हाल ही में उन्हें आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में उपनेता की जिम्मेदारी सौंपी थी। यह पद उन्हें राघव चड्ढा के स्थान पर दिया गया था, जिसके बाद वे राजनीतिक रूप से अधिक चर्चा में आए। इस कार्रवाई को लेकर आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सामाजिक मंच ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह कदम आगामी चुनावों की तैयारी का हिस्सा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए कर रही है। वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पंजाब में चुनावों को देखते हुए इस प्रकार की कार्रवाई की जा रही है, लेकिन राज्य की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी और उचित जवाब देगी। दूसरी ओर, ईडी के अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे किसी भी प्रकार से राजनीतिक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। एजेंसी का दावा है कि उनके पास पर्याप्त आधार और दस्तावेज हैं, जिनके आधार पर यह कार्रवाई की जा रही है। अशोक मित्तल को वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए नामित किया था, जहां वे निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। वर्तमान में वे वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। हालांकि, उन्हें अधिक प्रमुखता तब मिली जब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में उपनेता बनाया। इस बीच, राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटाए जाने के बाद पार्टी के भीतर मतभेदों की चर्चा भी तेज हुई थी। बीते कुछ समय से उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच संबंधों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यहां तक कि कुछ मुद्दों पर उनकी सार्वजनिक चुप्पी और अलग रुख को भी राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई से आगामी चुनावों से पहले सियासी माहौल और अधिक गरमा सकता है। एक ओर जहां जांच एजेंसियां अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बता रही हैं, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में पेश कर रहा है। फिलहाल, यह मामला जांच के दायरे में है और आने वाले दिनों में इससे जुड़े और तथ्य सामने आने की संभावना है। इस बीच, देश की राजनीति में इस घटनाक्रम ने नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें जांच एजेंसियों की भूमिका और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।


