जी-7 शिखर सम्मेलन में रूस पर सख्ती के संकेत, भारत के सस्ते तेल आयात पर मंडराया संकट

  • रूसी तेल पर दी गई अस्थायी छूट समाप्त करने की तैयारी में अमेरिका, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ी चिंता
  • यूक्रेन युद्ध फिर बना वैश्विक एजेंडा, रूस की ऊर्जा आय रोकने के लिए जी-7 देशों ने कड़ा रुख अपनाया

नई दिल्ली। फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक संकेत सामने आया है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण रूस-यूक्रेन युद्ध वैश्विक विमर्श में अपेक्षाकृत पीछे चला गया था, लेकिन अब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने एक बार फिर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। इसका सीधा असर भारत समेत उन देशों पर पड़ सकता है जो रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जी-7 सम्मेलन के दौरान संकेत दिए हैं कि रूस से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को जल्द समाप्त किया जा सकता है। यह छूट वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने और ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से दी गई थी। हालांकि अब अमेरिका का मानना है कि पश्चिम एशिया में स्थिति अपेक्षाकृत सामान्य होने के बाद रूस के खिलाफ फिर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक चले तनाव के दौरान वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाए रखने के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाने पड़े थे। उस समय तेल की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि को रोकना प्राथमिकता थी। अब जबकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने लगी है, अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की स्थिति में है। जी-7 देशों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति बनती दिखाई दे रही है कि रूस की ऊर्जा आय को सीमित किया जाए। इसी दिशा में ब्रिटेन और कनाडा ने रूस के तथाकथित छाया तेल बेड़े तथा ऊर्जा निर्यात नेटवर्क पर नए प्रतिबंधों की घोषणा की है। पश्चिमी देशों का मानना है कि ऊर्जा निर्यात से प्राप्त आय रूस की युद्ध क्षमता को मजबूत कर रही है, इसलिए इस स्रोत को सीमित करना आवश्यक है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष महत्व रखती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई थी। इससे देश को ऊर्जा आयात पर होने वाले व्यय को नियंत्रित करने में मदद मिली और घरेलू बाजार में ईंधन कीमतों पर दबाव कम हुआ। लेकिन यदि अमेरिका प्रतिबंधों को पुनः कड़ा करता है, तो भारतीय तेल कंपनियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिबंधों की वापसी से न केवल तेल आयात महंगा हो सकता है, बल्कि भुगतान व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे आयात लागत बढ़ने की संभावना है। जी-7 सम्मेलन में शामिल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान समुद्री व्यापार मार्गों में आई बाधाओं तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभाव को रेखांकित किया। भारत ने लगातार यह चिंता जताई है कि किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। सम्मेलन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी भाग लिया। उन्होंने जी-7 देशों से रूस के खिलाफ और अधिक कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग की। जेलेंस्की का कहना था कि रूस को वार्ता के लिए मजबूर करने का सबसे प्रभावी तरीका उसकी आर्थिक क्षमता को सीमित करना है। उन्होंने अपने देश की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त रक्षा प्रणालियों और मिसाइल रोधी उपकरणों की भी मांग की। इस बीच ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत अभी भी रूस के प्रमुख खरीदारों में शामिल है। यूरोपीय शोध संस्था ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र की हालिया रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश रहा। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल और अन्य ईंधनों का आयात बढ़कर लगभग 5.8 अरब यूरो तक पहुंच गया। रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल रूसी आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पादों और कोयले का आयात भी महत्वपूर्ण स्तर पर दर्ज किया गया। मई माह में रूस से कच्चे तेल के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिसने कुल आयात को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। अब सभी की निगाहें 17 जून के बाद अमेरिका की अगली नीति पर टिकी हैं। यदि प्रतिबंधों में छूट आगे नहीं बढ़ाई जाती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई हलचल देखने को मिल सकती है। भारत के सामने भी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती पहले से अधिक जटिल हो जाएगी। आने वाले दिनों में वैश्विक तेल बाजार की दिशा और भारत की रणनीति दोनों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।

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