January 25, 2026

165 साल बाद शारदीय नवरात्र पर बना महासंयोग, नवरात्र और पितृपक्ष में एक महीने का अंतर से बना ये संयोग

पटना। प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष के समापन के अगले दिन से शारदीय नवरात्र आरंभ हो जाता है और कलश स्थापना के साथ नौ दिवसीय नवरात्र की पूजा होती है। इस बार पितृपक्ष समाप्त होते ही अधिकमास लग जाएगा। अधिकमास लगने से नवरात्र और पितृपक्ष के बीच एक महीने का अंतर आ जाएगा। आश्विन मास में मलमास लगना और एक महीने के अंतर पर दुर्गा पूजा आरंभ होना, ऐसा संयोग करीब 165 साल बाद लग रहा है।
चातुर्मास की अवधि होगी पांच महीने
ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने पंचांगों के हवाले से बताया कि इस साल लीप वर्ष एवं अधिकमास होने के कारण चातुर्मास जो चार मास का होता है, इस बार पांच महीने का हो गया है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक 165 साल बाद लीप ईयर और अधिकमास दोनों ही एक साल में हो रहे हैं। चातुर्मास लगने से विवाह, मुंडन, उपनयन, गृहप्रवेश आदि मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इस काल में पूजा-पाठ, व्रत, उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान भगवान श्रीहरि निंद्रा में चले जाते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद देव निंद्रा से जागृत होते हैं।
आश्विन माह में लगेंगे मलमास
हिन्दू पंचांग के अनुसार इस वर्ष आश्विन माह में मलमास लग रहा है। आश्विन मास दो होंगे। आश्विन मास में पितृपक्ष, श्राद्ध और नवरात्रि, दशहरा जैसे त्योहार होते हैं। अधिकमास लगने के कारण इस बार शारदीय नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरू होकर दशहरा 26 अक्टूबर को खत्म होगा। वही दीपावली का पर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या 14 नवंबर को मनाई जाएगी।
ऐसे होता है अधिकमास
ज्योतिषी झा के अनुसार एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना गया है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से मलमास या अधिकमास कहते हैं। इस पूरे माह में सूर्य की संक्रांति नहीं होने के कारण इस मास को मलिन माना गया है।
इसलिए नाम मिला पुरुषोत्तम मास
पौराणिक मान्यताओं में बताया गया है कि मलिन मास होने के कारण कोई भी देवता इस माह में अपनी पूजा नहीं करवाना चाहते थे और कोई भी इस माह के देवता नहीं बनना चाहते थे, तब मलमास ने स्वयं श्रीहरि से उन्हें स्वीकार करने का निवेदन किया। तब श्रीहरि ने इस महीने को अपना नाम दिया पुरुषोत्तम। तब से इस महीने को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस महीने में भागवत कथा सुनने और प्रवचन सुनने का विशेष महत्व माना गया है। साथ ही दान-पुण्य करने से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।

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