बिहार में तेजी से सिमट रहा एटीएम नेटवर्क, नौ महीनों में 371 नकदी निकासी केंद्र बंद, ग्राहक परेशान

  • राजधानी पटना सबसे अधिक प्रभावित, डिजिटल भुगतान बढ़ने से बैंकों ने कम उपयोग वाले केंद्रों पर लगाए ताले
  • बैंक शाखाओं की संख्या बढ़ी, लेकिन नकदी पर निर्भर लोगों के सामने खड़ी हुई नई चुनौती

पटना। डिजिटल भुगतान व्यवस्था के तेजी से विस्तार के बीच बिहार में नकदी निकालना आम लोगों के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बैंक एक-एक कर अपने नकदी निकासी केंद्र बंद कर रहे हैं, जिससे शहरों, कस्बों और ग्रामीण बाजारों में नकद लेन-देन करने वाले लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2025 से दिसंबर 2025 के बीच बिहार में कुल 371 स्वचालित नकदी निकासी केंद्र स्थायी रूप से बंद कर दिए गए। सबसे अधिक असर राजधानी पटना पर पड़ा है, जहां अकेले 117 केंद्रों पर ताले लग गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में नकदी आधारित अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2025 तक बिहार में कुल 7,269 स्वचालित नकदी निकासी केंद्र संचालित थे। दिसंबर 2025 के अंत तक इनकी संख्या घटकर 6,898 रह गई। इस प्रकार केवल नौ महीनों के भीतर राज्य ने अपने 371 केंद्र खो दिए। बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जून 2026 की तिमाही रिपोर्ट जारी होने के बाद यह संख्या और कम होने की संभावना है, क्योंकि कई बैंक कम उपयोग वाले केंद्रों की समीक्षा कर रहे हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां एक ओर नकदी निकासी केंद्रों की संख्या लगातार घट रही है, वहीं दूसरी ओर बैंक शाखाओं का विस्तार जारी है। मार्च 2025 तक राज्य में 8,365 बैंक शाखाएं कार्यरत थीं, जो दिसंबर 2025 तक बढ़कर 8,420 हो गईं। इसके बावजूद शाखा परिसरों से बाहर स्थापित स्वतंत्र नकदी निकासी केंद्र तेजी से बंद किए जा रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बैंक अपनी सेवाओं का पुनर्गठन कर रहे हैं और कम उपयोग वाले केंद्रों को आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं मान रहे हैं। बैंकों का कहना है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली, विशेष रूप से त्वरित भुगतान मंच के बढ़ते उपयोग ने लोगों की भुगतान संबंधी आदतों में बड़ा बदलाव ला दिया है। पहले जहां अधिकांश लोग नकदी निकालकर खरीदारी करते थे, वहीं अब मोबाइल आधारित भुगतान का चलन तेजी से बढ़ा है। बैंक अधिकारियों के अनुसार कई स्वतंत्र नकदी निकासी केंद्रों पर प्रतिदिन 170 से भी कम ग्राहक पहुंच रहे थे। ऐसे केंद्रों पर भवन किराया, सुरक्षा व्यवस्था, बिजली, नकदी भरने, रखरखाव तथा तकनीकी संचालन पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा था, जिससे उनका संचालन घाटे का सौदा बन गया। हालांकि इस बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव उन लोगों पर पड़ा है, जिनकी आजीविका अभी भी नकद लेन-देन पर निर्भर है। छोटे दुकानदार, सब्जी विक्रेता, किराना व्यापारी, दिहाड़ी मजदूर और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग अचानक नकदी की आवश्यकता होने पर कठिनाई का सामना कर रहे हैं। पहले जहां उन्हें अपने घर या बाजार के निकट ही नकदी निकासी केंद्र उपलब्ध हो जाता था, वहीं अब कई स्थानों पर कई किलोमीटर दूर जाकर नकदी निकालनी पड़ रही है। इससे समय और परिवहन दोनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। राजधानी पटना के अलावा मुजफ्फरपुर में 27 तथा वैशाली जिले में 20 स्वचालित नकदी निकासी केंद्र बंद किए गए हैं। इन जिलों के बाजारों में आज भी छोटी राशि के नकद भुगतान का व्यापक उपयोग होता है। विशेष रूप से 100 से 500 रुपये तक के लेन-देन तथा छुट्टे पैसों की आवश्यकता वाले कारोबारों में नकदी की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में निकटवर्ती केंद्रों के बंद होने से व्यापारियों और ग्राहकों दोनों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। नकदी निकासी केंद्रों को बंद करने की प्रक्रिया में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र के बैंक शामिल हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सरकारी बैंकों ने 220 तथा निजी बैंकों ने 125 केंद्र बंद किए हैं। इससे स्पष्ट है कि लागत घटाने और संसाधनों के बेहतर उपयोग की नीति दोनों क्षेत्रों के बैंकों द्वारा अपनाई जा रही है। बैंक विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भी कम उपयोग वाले केंद्रों की संख्या घट सकती है और डिजिटल माध्यमों पर अधिक जोर दिया जाएगा। इस बीच एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। गया जिले में इसी अवधि के दौरान पांच नए स्वचालित नकदी निकासी केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिससे स्थानीय लोगों को कुछ राहत मिली है। हालांकि यह संख्या पूरे राज्य में बंद हुए केंद्रों की तुलना में बहुत कम है। इसलिए राज्यभर में नकदी निकासी केंद्रों के लगातार सिमटते नेटवर्क ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है कि डिजिटल भुगतान के इस दौर में भी नकदी पर निर्भर बड़ी आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे सुनिश्चित की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ नकदी आधारित व्यवस्था को भी संतुलित रूप से बनाए रखना आवश्यक है, ताकि किसी भी वर्ग को बैंकिंग सुविधाओं से वंचित न होना पड़े।

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