कलकत्ता उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान्यता बरकरार

  • तृणमूल कांग्रेस को न्यायालय से झटका, विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को मिली कानूनी मंजूरी
  • पार्टी में बढ़ती अंदरूनी कलह आई सामने, विपक्ष के नेतृत्व को लेकर विवाद ने पकड़ा तूल

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उठापटक के बीच तृणमूल कांग्रेस को उस समय बड़ा झटका लगा जब कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में दी गई मान्यता को वैध ठहरा दिया। न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बोस के उस निर्णय को सही माना, जिसमें उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को विपक्ष का वैध समूह मानते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित किया था। इस फैसले के साथ ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेतृत्व को लेकर कई सप्ताह से चल रहा राजनीतिक और कानूनी विवाद फिलहाल समाप्त होता दिखाई दे रहा है। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस निर्णय का असर तृणमूल कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और राज्य की विपक्षी राजनीति दोनों पर पड़ सकता है।
न्यायालय पहुंचा था मामला
दरअसल, विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी थी। विधानसभा में पर्याप्त संख्या होने के कारण नेता प्रतिपक्ष का पद स्वाभाविक रूप से तृणमूल कांग्रेस के हिस्से में आने वाला था। इसी क्रम में पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतक बनाए जाने का प्रस्ताव तैयार किया। छह मई को पार्टी की ओर से इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक अनुशंसा भेजी गई। लेकिन इसके तुरंत बाद पार्टी के भीतर असहमति के स्वर उभरने लगे। कई विधायकों ने दावा किया कि जिस बैठक के आधार पर यह प्रस्ताव भेजा गया, उसमें इस प्रकार का कोई निर्णय लिया ही नहीं गया था।
हस्ताक्षरों को लेकर उठे सवाल
विवाद उस समय और गहरा गया जब विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा सहित कई नेताओं ने आरोप लगाया कि विधानसभा अध्यक्ष को भेजी गई सूची में कई विधायकों के हस्ताक्षर वास्तविक नहीं हैं। उनका दावा था कि कम से कम 14 विधायकों के हस्ताक्षर कथित रूप से फर्जी तरीके से जोड़े गए हैं। इन आरोपों के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद हैं।
पार्टी से निष्कासन के बाद बढ़ा विवाद
आरोपों और विरोध के बीच तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने एक जून को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी का मानना था कि दोनों नेता संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और पार्टी अनुशासन का उल्लंघन कर रहे हैं। हालांकि निष्कासन के बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ। इसके विपरीत, ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी के कई नाराज विधायकों को अपने साथ जोड़ लिया और विधानसभा में अलग शक्ति प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं को विपक्षी विधायकों का नेता बताते हुए नेता प्रतिपक्ष पद पर दावा पेश कर दिया।
58 विधायकों के समर्थन का दावा
राजनीतिक घटनाक्रम ने नया मोड़ तब लिया जब ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। उनके समर्थक विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अपना पक्ष रखा और अलग विपक्षी समूह के रूप में मान्यता की मांग की। स्थिति का परीक्षण करने के बाद विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को मान्यता प्रदान कर दी। साथ ही उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया गया। इस निर्णय ने तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व को असहज स्थिति में ला दिया।
उच्च न्यायालय ने अध्यक्ष के फैसले को माना सही
विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती देते हुए शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि अध्यक्ष का फैसला नियमों और परंपराओं के अनुरूप नहीं है तथा इसे निरस्त किया जाना चाहिए। मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को उचित ठहराया। न्यायालय ने माना कि उपलब्ध तथ्यों और समर्थन के आधार पर अध्यक्ष द्वारा लिया गया निर्णय वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप था। इसके साथ ही ऋतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता बरकरार रखी गई।
राजनीतिक प्रभाव दूरगामी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक पद को लेकर हुए विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रही गुटबाजी को भी उजागर करता है। विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी में बढ़ते मतभेद अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। वहीं विपक्षी दल इस फैसले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जीत बता रहे हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के सामने अब संगठनात्मक एकता बनाए रखने और असंतुष्ट नेताओं को साधने की चुनौती और बड़ी हो गई है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस फैसले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस इस राजनीतिक झटके से कैसे उबरती है और विधानसभा के भीतर विपक्ष की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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