आसाराम को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद की सजा बरकरार
- नाबालिग से दुष्कर्म मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपील खारिज की, तुरंत आत्मसमर्पण का आदेश
- सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को मिली राहत, अदालत ने दोनों को दोषमुक्त किया
जोधपुर। नाबालिग छात्रा से यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म के बहुचर्चित मामले में स्वयंभू संत आसाराम बापू को राजस्थान उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। जोधपुर स्थित उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों के आधार पर निचली अदालत का फैसला उचित था और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने पैरोल पर बाहर चल रहे आसाराम को तुरंत आत्मसमर्पण करने का आदेश भी जारी किया है। यह फैसला न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि नाबालिग पीड़िता के साथ दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में दोष सिद्ध होने के बाद सजा में किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती। हालांकि इसी मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। इससे पहले निचली अदालत ने दोनों को 20-20 वर्ष की सजा सुनाई थी। यह मामला वर्ष 2013 में सामने आया था, जब एक नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया था कि उसे आध्यात्मिक उपचार और धार्मिक मार्गदर्शन के बहाने जोधपुर स्थित आश्रम में बुलाया गया, जहां उसके साथ यौन शोषण और दुष्कर्म किया गया। पीड़िता के बयान के बाद यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच शुरू की और बाद में आसाराम को गिरफ्तार कर लिया गया। लंबी सुनवाई और विभिन्न साक्ष्यों के परीक्षण के बाद जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 25 अप्रैल 2018 को आसाराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि पीड़िता के बयान, चिकित्सकीय रिपोर्ट, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और अन्य गवाहों के आधार पर अपराध सिद्ध होता है। इसी मामले में शरतचंद और शिल्पी को भी दोषी मानते हुए 20-20 साल के कारावास की सजा दी गई थी। निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए सभी आरोपियों ने राजस्थान उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। उच्च न्यायालय में इस मामले की लगातार सुनवाई हुई। फरवरी 2026 से अप्रैल 2026 तक प्रतिदिन आधार पर सुनवाई चली, जिसमें अभियोजन और बचाव पक्ष ने विस्तृत दलीलें पेश कीं। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने 20 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बुधवार को अदालत ने अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए आसाराम की सजा को बरकरार रखा। फैसले के समय आसाराम अंतरिम जमानत पर बाहर चल रहे थे। कुछ दिन पहले ही उनकी जमानत की अवधि 7 जुलाई तक बढ़ाई गई थी, लेकिन अब अदालत के आदेश के बाद उन्हें तुरंत आत्मसमर्पण करना होगा। अदालत के इस फैसले के बाद देशभर में एक बार फिर यह मामला चर्चा में आ गया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला यौन अपराधों के मामलों में न्याय व्यवस्था की गंभीरता को दर्शाता है। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि पीड़िता के आरोप पूरी तरह विश्वसनीय हैं और जांच के दौरान मिले साक्ष्य अपराध को सिद्ध करते हैं। वहीं बचाव पक्ष ने सजा को चुनौती देते हुए कई कानूनी तर्क दिए थे, लेकिन अदालत ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि नाबालिग पीड़िता के साथ हुए अपराध को लेकर निचली अदालत का निर्णय तथ्यों और कानून के अनुरूप है। उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब आसाराम के सामने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प बचा है। हालांकि फिलहाल उन्हें अदालत के आदेश का पालन करते हुए जेल लौटना होगा। दूसरी ओर पीड़िता पक्ष ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे न्याय की जीत बताया है। इस निर्णय को देश में महिला और बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।


