बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार से पहले सियासी हलचल तेज, रालोमो के भाजपा में विलय की अटकलें तेज
- कम मंत्रियों के साथ चल रही सरकार, विभागों का भारी बोझ बना चर्चा का केंद्र
- उपेंद्र कुशवाहा ने विलय की अटकलों को बताया निराधार, पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें
पटना। बिहार में नई सरकार के गठन के बाद से ही मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मौजूदा समय में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार सीमित मंत्रियों के साथ काम कर रही है, जिसके कारण प्रशासनिक दबाव और राजनीतिक चर्चाएं दोनों बढ़ती जा रही हैं। वर्तमान में सरकार में केवल दो मंत्री हैं, जिनमें स्वयं मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री शामिल हैं, जबकि कई विभागों की जिम्मेदारी सीमित हाथों में केंद्रित है। जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास अकेले 29 विभागों की जिम्मेदारी है। वहीं उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी के पास 10 विभाग और वरिष्ठ नेता बिजेंद्र यादव के पास 8 विभाग हैं। इतने बड़े पैमाने पर विभागों का बंटवारा सीमित मंत्रियों के बीच होने के कारण प्रशासनिक कार्यों की गति और प्रभावशीलता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। यही कारण है कि जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार की संभावना जताई जा रही है। इसी बीच राज्य की राजनीति में एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भारतीय जनता पार्टी में विलय की संभावना को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की ओर से रालोमो प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी विलय का प्रस्ताव दिया गया है। इस प्रस्ताव के तहत उनके पुत्र दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने और मौजूदा मंत्री पद को बरकरार रखने का आश्वासन दिए जाने की चर्चा है। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि यह विलय होता है तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर नए समीकरण बन सकते हैं। इससे न केवल सत्ता संतुलन प्रभावित होगा, बल्कि आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में भी इसका असर देखने को मिल सकता है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यह मामला फिलहाल अटकलों तक ही सीमित है। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में रालोमो कोटे से दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया गया था, जबकि उस समय वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। वर्ष 2025 के चुनाव के बाद गठित मंत्रिमंडल में रालोमो का यह प्रतिनिधित्व राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया था। अब जब सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार का गठन हुआ है, तो पार्टी की भूमिका और भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। दूसरी ओर, रालोमो के भीतर भी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के चार में से तीन विधायक नेतृत्व की नीतियों से नाराज हैं। हालांकि, पार्टी की ओर से इस तरह के असंतोष की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे संभावित विलय की एक बड़ी वजह के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले भी कई बार इस तरह की खबरें सामने आ चुकी हैं, जिससे अटकलों को और बल मिला है। इन तमाम चर्चाओं के बीच उपेंद्र कुशवाहा ने स्पष्ट रूप से किसी भी तरह के विलय की संभावना से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि राजनीति में इस तरह की बातें आम होती हैं और उन्हें किसी भी प्रकार के विलय प्रस्ताव की कोई जानकारी नहीं है। उनके इस बयान के बाद भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। बिहार की राजनीति इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है, जहां एक ओर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर दबाव है, वहीं दूसरी ओर गठबंधन की राजनीति नए मोड़ लेती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि रालोमो के विलय की चर्चाएं महज अफवाह साबित होती हैं या फिर राज्य की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।


