आप को राज्यसभा में बड़ा झटका, सात सांसदों का भाजपा में विलय मंजूर

  • विलय के बाद भाजपा की संख्या 113 पहुंची, आप की ताकत घटकर तीन सांसदों पर सिमटी
  • नेतृत्व पर उपेक्षा के आरोप, पार्टी के भीतर बढ़ी कलह उजागर

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को राज्यसभा में बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। राज्यसभा सचिवालय ने पार्टी के सात बागी सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में विलय को मंजूरी दे दी है और इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। इस निर्णय के साथ ही ये सभी सांसद अब औपचारिक रूप से भाजपा का हिस्सा बन गए हैं। इस घटनाक्रम ने न केवल आप की संसदीय स्थिति को कमजोर किया है, बल्कि उच्च सदन में शक्ति संतुलन को भी बदल दिया है। विलय के बाद राज्यसभा में भाजपा के सदस्यों की संख्या बढ़कर 113 हो गई है, जो पार्टी के इतिहास में पहली बार इतना बड़ा आंकड़ा है। वहीं दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी की ताकत घटकर 10 से सीधे तीन सांसदों तक सिमट गई है। यह गिरावट पार्टी के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही थी। जानकारी के अनुसार, भाजपा में शामिल होने वाले सातों सांसद पंजाब से जुड़े हुए थे। इस घटनाक्रम के बाद अब पंजाब से आप के पास केवल एक राज्यसभा सांसद ही बचा है। बलबीर सिंह सीचेवाल ने पार्टी नहीं छोड़ी है और वे अब भी आप के साथ बने हुए हैं। हालांकि, अन्य सांसदों ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें लंबे समय से उपेक्षित किया जा रहा था और पार्टी की दिशा भटक गई है, जिसके कारण उन्होंने यह कदम उठाया। इस मामले में आप ने पहले ही राज्यसभा के सभापति को अर्जी देकर इन सांसदों के विलय को चुनौती दी थी और कुछ की सदस्यता समाप्त करने की मांग भी की थी। लेकिन राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन ने सोमवार को सभी सात सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी। उनके इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। भाजपा में शामिल होने वाले प्रमुख नेताओं में राघव चड्ढा, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल और राजिंदर गुप्ता के नाम शामिल हैं। इनमें से संदीप पाठक का नाम सबसे अधिक चर्चा में है, जिन्हें लंबे समय तक अरविंद केजरीवाल का करीबी माना जाता रहा है और वे पंजाब से जुड़े मामलों को संभालते रहे थे। सूत्रों के मुताबिक, संदीप पाठक ने हाल ही में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कर पंजाब में उपेक्षा की शिकायत की थी। वहीं, विक्रमजीत सिंह साहनी ने यह दावा किया है कि केजरीवाल ने स्वयं उन्हें इस्तीफे पर विचार करने की सलाह दी थी, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। इन बयानों ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को और उजागर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आप के भीतर गहराते असंतोष और नेतृत्व संकट की ओर संकेत करता है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के एक साथ अलग होने से संगठनात्मक मजबूती पर सवाल उठने लगे हैं। दूसरी ओर, भाजपा को इस घटनाक्रम से राज्यसभा में स्पष्ट रूप से मजबूती मिली है, जिससे आने वाले समय में विधायी कार्यों को पारित कराने में उसे सहूलियत मिल सकती है। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर आप को अपने संगठन को संभालने और आंतरिक मतभेदों को दूर करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा, वहीं भाजपा के लिए यह राजनीतिक बढ़त साबित हो सकती है। आने वाले दिनों में इस घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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