February 25, 2026

वक्फ बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची राजद, दाखिल की याचिका

नई दिल्ली/पटना। वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में हलचल लगातार बनी हुई है। अब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। पार्टी की ओर से राज्यसभा सांसद प्रोफेसर मनोज झा और लोकसभा सांसद फैयाज अहमद ने यह याचिका दाखिल की है। राजद का कहना है कि यह कानून संविधान के मूल स्वरूप के खिलाफ है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन करता है।
पहले भी हो चुकी हैं कई याचिकाएं
गौरतलब है कि इससे पहले भी कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में इसी विधेयक के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। अब तक इस विधेयक के खिलाफ 10 से अधिक याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। इससे साफ है कि इस कानून को लेकर देश के राजनीतिक दलों के बीच गहरी असहमति है और मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है।
विधेयक बन चुका है कानून
लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ यह विधेयक अब कानून बन चुका है। इसके बावजूद इसके खिलाफ विरोध कम नहीं हो रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार इस कानून के जरिए वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण पाना चाहती है और अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों को सीमित कर रही है।
राजद का सरकार पर तीखा हमला
राजद इस मुद्दे पर लगातार केंद्र सरकार के साथ-साथ बिहार की एनडीए सरकार को भी घेर रही है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस विधेयक को पूरी तरह से संविधान विरोधी बताते हुए तीखा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी तो इस कानून को लागू नहीं किया जाएगा और इसे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाएगा।
तेजस्वी ने बताया इसे ध्रुवीकरण का प्रयास
तेजस्वी यादव ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह केवल मुसलमानों को ही नहीं, बल्कि दलितों और पिछड़ों को भी निशाना बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा इस तरह के कानूनों के जरिए जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असल मुद्दों से भटकाना चाहती है ताकि ध्रुवीकरण के जरिए राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।
अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी निगाहें
अब जबकि इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, सभी की निगाहें अब अदालत के निर्णय पर टिकी हुई हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को संविधान के अनुरूप मानता है या इसमें बदलाव की जरूरत महसूस करता है। इस मामले का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है।

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