युद्धविराम के बावजूद फिर भड़का तनाव, अमेरिका की बमबारी के बाद ईरान ने खोले मिसाइल अड्डे
- रडार और नियंत्रण केंद्रों पर हमले का अमेरिकी दावा, कुवैत के सैन्य अड्डे को निशाना बनाने की बात स्वीकार कर रहा ईरान
- फारस की खाड़ी में बढ़ी बेचैनी, आर्थिक संकट और महंगाई के खिलाफ ईरान में भी तेज हुए विरोध प्रदर्शन
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच युद्धविराम लागू होने के बावजूद सैन्य गतिविधियों और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका ने दावा किया है कि उसने ईरान के कई महत्वपूर्ण रडार केंद्रों और सैन्य नियंत्रण ठिकानों पर हवाई हमला किया है। वहीं ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए पड़ोसी देशों के सैन्य अड्डों का उपयोग कर रहा है। इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में एक बार फिर अस्थिरता और संघर्ष की आशंका को बढ़ा दिया है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार आत्मरक्षा के अधिकार के तहत ईरान के गुरुक और केश्म द्वीप स्थित सैन्य ठिकानों पर बमबारी की गई। अमेरिका का दावा है कि इन क्षेत्रों से उसकी सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा था। हालांकि ईरान ने अमेरिकी दावे को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका लगातार युद्धविराम की भावना का उल्लंघन कर रहा है और क्षेत्र में तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि हाल ही में कुवैत स्थित एक सैन्य अड्डे का उपयोग अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। इसी कारण उस क्षेत्र को निशाना बनाया गया। ईरान का आरोप है कि अमेरिका पड़ोसी देशों की भूमि का उपयोग कर उसके खिलाफ अभियान चला रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने कई मिसाइल अड्डों को दोबारा सक्रिय कर लिया है। उपग्रह चित्रों के विश्लेषण के आधार पर यह जानकारी सामने आई है कि जिन सैन्य ठिकानों को पहले अमेरिकी हमलों में नुकसान पहुंचा था, उनमें से अधिकांश की मरम्मत पूरी कर ली गई है। बताया जा रहा है कि सुरंगों के भीतर बने इन अड्डों की सुरक्षा को और मजबूत किया गया है तथा उनके प्रवेश मार्गों को विशेष रूप से संरक्षित किया गया है।रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका द्वारा निशाना बनाए गए 69 ठिकानों में से लगभग 50 स्थानों पर मरम्मत और पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है। भारी मशीनों, बुलडोजरों और मालवाहक वाहनों की मदद से मलबा हटाया गया तथा क्षतिग्रस्त सड़कों और संरचनाओं को फिर से तैयार किया गया। इससे संकेत मिल रहे हैं कि ईरान एक बार फिर लंबी दूरी की मिसाइल क्षमताओं को सक्रिय करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के अनुसार युद्धविराम लागू होने के तुरंत बाद ही ईरान ने अपने सैन्य ढांचे को पुनर्जीवित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया था। अब इन प्रयासों के परिणाम सामने आने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता है, तो क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ सकता है।दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की कोशिशें भी जारी हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय माध्यमों से दोनों पक्षों के बीच बातचीत के प्रयास किए जा रहे हैं। खबरों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तैयार संशोधित प्रस्ताव कई बार मध्यस्थ देशों के माध्यम से ईरान तक पहुंचाया गया है। बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया में पाकिस्तान भी मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। हालांकि प्रस्ताव के प्रमुख बिंदुओं को सार्वजनिक नहीं किया गया है और ईरान की ओर से भी अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बावजूद समुद्री व्यापार पूरी तरह प्रभावित नहीं हुआ है। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया है कि पिछले चौबीस घंटों के दौरान तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों सहित 28 वाणिज्यिक पोत होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित रूप से गुजरे। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी बीच ईरान के दक्षिण पार्स गैस क्षेत्र में उत्पादन गतिविधियां भी धीरे-धीरे बहाल की जा रही हैं। कुछ उत्पादन मंचों पर कार्य फिर शुरू हो गया है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र को राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि देश की आर्थिक स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। बढ़ती महंगाई, वेतन संबंधी समस्याओं और पेंशन भुगतान में देरी को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। खुजेस्तान प्रांत में मजदूरों और पेंशनभोगियों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर आर्थिक संकट पर चिंता व्यक्त की है। पश्चिम एशिया की स्थिति अभी भी बेहद संवेदनशील बनी हुई है। एक ओर सैन्य तनाव और हमलों की घटनाएं जारी हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयास भी चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकाल पाएंगे या फिर क्षेत्र एक नए और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ेगा।


