मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत की बड़ी तैयारी, समुद्र के नीचे खोजे जाएंगे तेल और गैस के भंडार

  • बंगाल की खाड़ी से अंडमान तक व्यापक भूगर्भीय सर्वेक्षण की योजना शुरू
  • ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने और भविष्य की जरूरतें पूरी करने की दिशा में बड़ा कदम

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कड़ी निगरानी के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है। इस समुद्री मार्ग से कच्चे तेल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति प्रभावित होने लगी है, जिसका असर भारत समेत कई देशों पर दिखाई दे रहा है। इसी स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार अब समुद्र के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज के लिए व्यापक सर्वेक्षण अभियान शुरू करने जा रही है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय बंगाल की खाड़ी और देश के पूर्वी समुद्री क्षेत्रों में गहरे समुद्र के नीचे तेल और गैस के संभावित भंडारों का पता लगाने के लिए विशेष भूगर्भीय सर्वेक्षण करेगा। इस परियोजना के लिए 14 मई 2026 को निविदाएं आमंत्रित की गई हैं। सरकार का उद्देश्य देश में ऊर्जा संसाधनों की खोज बढ़ाना और आयात पर निर्भरता को कम करना है। तकनीकी रूप से इस परियोजना को द्वि-आयामी ब्रॉडबैंड समुद्री भूकंपीय तथा गुरुत्व-चुंबकीय आंकड़ा संग्रहण, प्रसंस्करण और विश्लेषण परियोजना कहा जा रहा है। आसान भाषा में समझें तो यह समुद्र के नीचे मौजूद भूगर्भीय संरचनाओं का विशाल भूमिगत परीक्षण होगा। इसके तहत विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र में लंबे केबलनुमा उपकरणों को खींचते हुए आगे बढ़ेंगे। इन उपकरणों को स्ट्रीमर कहा जाता है। ये समुद्र तल के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे और चट्टानों से टकराकर वापस आने वाली गूंज को रिकॉर्ड करेंगे। इस आंकड़े के आधार पर वैज्ञानिक समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की संरचनाओं का नक्शा तैयार करेंगे और तेल तथा गैस के संभावित स्रोतों की पहचान करेंगे। यह परियोजना अगले दो वर्षों तक चलेगी और इसका दायरा काफी व्यापक होगा। सरकार बंगाल-पूर्णिया और महानदी बेसिन क्षेत्र में लगभग 45 हजार लाइन किलोमीटर तक सर्वेक्षण कराएगी। इसके अलावा अंडमान बेसिन और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में 43-43 हजार लाइन किलोमीटर तथा कावेरी बेसिन में 30 हजार लाइन किलोमीटर तक भूगर्भीय परीक्षण किया जाएगा। भारत वर्तमान में अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। प्राकृतिक गैस के मामले में भी देश काफी हद तक विदेशी आपूर्ति पर निर्भर है। ऐसे में पश्चिम एशिया में युद्ध या वैश्विक तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपने घरेलू ऊर्जा संसाधनों की खोज में सफल होता है तो इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता कम हो सकेगी। सरकारी अधिकारियों के अनुसार भारत का पूर्वी समुद्री तट अभी भी काफी हद तक अनछुआ माना जाता है। मुंबई हाई जैसे पश्चिमी तटों पर पहले से उत्पादन हो रहा है, लेकिन पूर्वी क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकों के जरिए विस्तृत सर्वेक्षण अभी सीमित रहा है। अब अत्याधुनिक भूकंपीय तकनीक के माध्यम से इन क्षेत्रों का सटीक भूगर्भीय नक्शा तैयार किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार बंगाल अपतटीय बेसिन में 10 किलोमीटर से अधिक मोटी तलछटी परतें मौजूद हैं। यहां विभिन्न भूगर्भीय कालों के हाइड्रोकार्बन स्रोत होने की संभावना है और कई स्थानों पर गैस के संकेत पहले ही मिल चुके हैं। महानदी बेसिन को भी व्यावसायिक उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत संभावनाशील माना जा रहा है। यहां गहरे समुद्री क्षेत्रों में गैस प्रणाली और जलाशयों की मौजूदगी की संभावना जताई गई है। अंडमान बेसिन को लेकर वैज्ञानिक विशेष रूप से उत्साहित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों से इसकी भूगर्भीय समानता होने के कारण यहां गैस के विशाल भंडार हो सकते हैं। इसके अलावा समुद्र के नीचे जमे मीथेन के भंडार भी यहां पाए जाने की संभावना है, जिन्हें भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है। कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से ही देश का प्रमुख गैस उत्पादक क्षेत्र है, लेकिन नए सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि इसके गहरे हिस्सों में अभी भी भारी मात्रा में अप्रयुक्त भंडार छिपे हो सकते हैं। वहीं कावेरी बेसिन में भी जुरासिक काल और गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल तथा गैस की नई संभावनाएं तलाश की जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि वैश्विक संकटों के दौरान देश की ऊर्जा आपूर्ति को भी स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।

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