September 19, 2026

भारत के पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का निधन, 71 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस

कोलकाता। देश की राजनीति से एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अध्याय का अंत हो गया है। पूर्व रेल मंत्री और पश्चिम बंगाल की राजनीति के कद्दावर नेता मुकुल रॉय का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने कोलकाता स्थित एक निजी अस्पताल में रात करीब एक बजकर तीस मिनट पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी शोक की लहर दौड़ गई है।
लंबे समय से अस्वस्थ थे मुकुल रॉय
परिवार के मुताबिक, मुकुल रॉय लंबे समय से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय ने बताया कि बीते कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी और डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज किया जा रहा था। बावजूद इसके, उम्र और बीमारी का असर उनके स्वास्थ्य पर भारी पड़ा और अंततः उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
युवा कांग्रेस से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
मुकुल रॉय का राजनीतिक जीवन कई दशकों तक फैला रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पश्चिम बंगाल में युवा कांग्रेस से की थी। संगठनात्मक राजनीति में उनकी गहरी समझ और रणनीतिक क्षमता ने उन्हें जल्द ही पहचान दिला दी। समय के साथ वह राज्य की राजनीति में एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे, जिन्हें संगठन खड़ा करने और नेताओं को जोड़ने में महारत हासिल थी।
तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल
जब तृणमूल कांग्रेस की स्थापना हुई, तो मुकुल रॉय उसके संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। वह लंबे समय तक पार्टी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। पार्टी के शुरुआती दौर में संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका अहम रही। ममता बनर्जी के संघर्ष के समय वह उनके भरोसेमंद सिपाही के रूप में सामने आए।
दिल्ली में पार्टी का बड़ा चेहरा
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार में भी मुकुल रॉय की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया और दिल्ली में वह टीएमसी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। वर्ष 2006 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके बाद 2009 से 2012 तक उन्होंने उच्च सदन में तृणमूल कांग्रेस के नेता के रूप में जिम्मेदारी निभाई। संसद में उनकी गिनती एक सधे हुए और रणनीतिक नेता के तौर पर होती थी।
सत्ता में आने के बाद बढ़ी भूमिका
वर्ष 2011 में जब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं, तो मुकुल रॉय की भूमिका और मजबूत हो गई। पार्टी महासचिव के रूप में उन्होंने संगठन विस्तार का काम संभाला। इसी दौरान बड़ी संख्या में वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा। राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि इन दल-बदल के पीछे मुकुल रॉय की रणनीति और संपर्कों की अहम भूमिका थी।
भारतीय जनता पार्टी में जाने का फैसला
नवंबर 2017 में मुकुल रॉय ने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। यह फैसला बंगाल की राजनीति में बड़ा झटका माना गया। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने पार्टी के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटों पर जीत हासिल की, तो इसके पीछे भी मुकुल रॉय की रणनीति को एक बड़ा कारण माना गया।
विधानसभा चुनाव और वापसी
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में मुकुल रॉय ने भाजपा के टिकट पर कृष्णनगर उत्तर सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। हालांकि चुनाव के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया और जून 2021 में दोबारा तृणमूल कांग्रेस में लौट आए। यह वापसी भी काफी चर्चा में रही और बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बने।
अयोग्यता और राजनीतिक विवाद
मुकुल रॉय का अंतिम राजनीतिक अध्याय विवादों से भी जुड़ा रहा। 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दल बदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य विधायक घोषित कर दिया था। इस फैसले के बाद वह सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हो गए थे। स्वास्थ्य कारणों से भी उनकी सार्वजनिक गतिविधियां काफी सीमित हो चुकी थीं।
राजनीति में रणनीतिकार के रूप में पहचान
मुकुल रॉय को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने संगठन और रणनीति की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वह पर्दे के पीछे रहकर बड़े फैसले लेने और राजनीतिक जोड़-तोड़ में माहिर माने जाते थे। चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दलों में उन्होंने अपने प्रभाव की छाप छोड़ी।
शोक की लहर और श्रद्धांजलि
उनके निधन के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा, दोनों खेमों में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनका स्थान खास था और उनके जाने से एक अनुभवी रणनीतिकार की कमी हमेशा महसूस की जाएगी। मुकुल रॉय का निधन न केवल एक व्यक्ति का जाना है, बल्कि बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का अंत भी है। उनका जीवन राजनीतिक उतार-चढ़ाव, सत्ता, संघर्ष और रणनीति से भरा रहा, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।

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