November 7, 2026

बिहार विधान परिषद में बहाली का ‘महाखेल’! एक विज्ञापन से 64 नियुक्तियां, लेकिन निशाने पर सिर्फ सात निजी सचिव; बिना बर्खास्तगी दफ्तर में प्रवेश पर भी रोक!

>>हाईकोर्ट पहुंचा नियुक्ति विवाद, सात नवनियुक्त निजी सहायकों ने री-एग्जाम के आदेश को दी चुनौती; 57 अन्य नियुक्तियां जांच के दायरे से बाहर क्यों? 22 दिसंबर को अगली सुनवाई

 

पटना। बिहार विधान परिषद में नियुक्तियों को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने परिषद सचिवालय की कार्यप्रणाली और बहाली प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ही विज्ञापन के जरिए 64 पदों पर नियुक्तियां हुईं, सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र मिला, उन्होंने सरकारी कार्यालय में योगदान दिया और दो-तीन महीने तक काम भी किया। लेकिन सत्ता और नेतृत्व में बदलाव के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि पूरी बहाली प्रक्रिया में से केवल सात निजी सहायकों को दोबारा परीक्षा देने का फरमान सुना दिया गया? यही नहीं, अब इन कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश से भी रोके जाने का मामला सामने आया है।

 

सवाल सिर्फ री-एग्जाम का नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया में कथित दोहरे मापदंड का भी है। आखिर एक ही विज्ञापन से नियुक्त 64 कर्मचारियों में से सिर्फ सात को ही संदेह के घेरे में क्यों रखा गया? क्या बाकी 57 नियुक्तियां पूरी तरह पाक-साफ हैं? या फिर कार्रवाई के पीछे कोई अलग कहानी है? बिहार विधान परिषद का यह पूरा घटनाक्रम अब प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

 

एक विज्ञापन, 64 नियुक्तियां और विवाद के केंद्र में सिर्फ सात!

 

दरअसल, बिहार विधान परिषद सचिवालय ने 26 नवंबर 2025 को विज्ञापन संख्या 2/25 जारी किया था। इसके तहत कुल 64 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इनमें सात निजी सहायक, 12 आशुलिपिक, 35 डाटा एंट्री ऑपरेटर और 10 निम्न वर्गीय लिपिक के पद शामिल थे।

 

लंबी चयन प्रक्रिया के बाद सितंबर 2026 में तत्कालीन सभापति अवधेश नारायण सिंह के कार्यकाल में सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए। चयनित उम्मीदवारों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद सचिवालय में योगदान भी दे दिया। निजी सहायक संवर्ग के सातों अभ्यर्थियों ने 10 से 12 सितंबर के बीच योगदान किया और नियमित रूप से अपने काम में जुट गए।

 

लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद इस नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। नेतृत्व परिवर्तन के बाद मामला नए कार्यकारी सभापति डॉ. रामवचन राय के समक्ष पहुंचा और इसके बाद घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।

 

22 अक्टूबर का फरमान: सात निजी सहायकों को फिर देनी होगी परीक्षा!

 

बिहार विधान परिषद सचिवालय ने 22 अक्टूबर 2026 को एक नोटिस जारी कर नवनियुक्त सात निजी सहायकों को दोबारा परीक्षा में शामिल होने का निर्देश दे दिया। इन सभी को 4 नवंबर को री-एग्जाम देना था।

 

इस आदेश ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया। सवाल यह है कि जब नियुक्तियां एक ही विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के तहत हुई थीं, तो फिर दोबारा परीक्षा के लिए केवल निजी सहायक संवर्ग के सात अभ्यर्थियों को ही क्यों चुना गया?

 

आशुलिपिक के 12, डाटा एंट्री ऑपरेटर के 35 और निम्न वर्गीय लिपिक के 10 पदों पर नियुक्त अभ्यर्थियों को लेकर ऐसी कोई समान कार्रवाई सामने नहीं आई है।

 

यानी 64 नियुक्तियों वाली प्रक्रिया में जांच या पुनर्परीक्षा की कार्रवाई का दायरा फिलहाल महज सात लोगों तक सीमित दिखाई दे रहा है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

 

सातों अभ्यर्थी पहुंचे हाईकोर्ट, सचिवालय से मांगा गया जवाब

 

सचिवालय के री-एग्जाम संबंधी आदेश को सातों नवनियुक्त निजी सहायकों ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी है। स्पृहा सिंह और छह अन्य अभ्यर्थियों की ओर से सिविल रिट याचिका (सीडब्ल्यूजेसी संख्या 16927/2026) दाखिल की गई है।

 

याचिका में 22 अक्टूबर को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत सातों अभ्यर्थियों को 4 नवंबर को दोबारा परीक्षा देने का निर्देश दिया गया था। इस मामले में 3 नवंबर 2026 को पटना हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

 

सुनवाई के दौरान अदालत ने बिहार विधान परिषद सचिवालय को पूरे मामले में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

 

इस तरह नियुक्ति विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में पहुंच चुका है। सचिवालय को अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर किन परिस्थितियों और आधारों पर केवल सात निजी सहायकों को दोबारा परीक्षा देने का आदेश दिया गया।

 

नियुक्ति पत्र भी मिला, योगदान भी किया, फिर दफ्तर में प्रवेश पर रोक क्यों?

 

विवाद ने शुक्रवार को उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब पूर्व सभापति के कार्यकाल में नियुक्त बड़ी संख्या में कर्मचारियों को विधान परिषद कार्यालय में प्रवेश करने से रोक दिए जाने की बात सामने आई।

 

बताया जा रहा है कि दर्जनों कर्मचारी कार्यालय परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलने के बाद परिषद कैंपस में ही मौजूद रहे। ये कर्मचारी पिछले दो से तीन महीने से नियमित रूप से सचिवालय में काम कर रहे थे।

 

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि इन कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर कोई प्रशासनिक या कानूनी आपत्ति थी, तो क्या उन्हें विधिवत बर्खास्त किया गया? क्या उनकी नियुक्ति रद्द करने का कोई औपचारिक आदेश जारी हुआ? यदि नहीं, तो कार्यालय में प्रवेश रोकने का आधार क्या है?

 

नियुक्ति पत्र मिलने, योगदान करने और नियमित रूप से काम करने के बाद अचानक कार्यालय में प्रवेश पर रोक लगाए जाने से कर्मचारियों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

 

ये हैं सात नवनियुक्त निजी सहायक

 

बिहार विधान परिषद ने विज्ञापन संख्या 2/25 के तहत 7 सितंबर 2026 को आप्त सचिव संवर्ग के सात स्थायी पदों पर नियुक्ति की थी। चयनित अभ्यर्थियों में स्पृहा सिंह, अमन कुमार, नमन राज, अंजली कुमारी आनंद, सुमित राज, गुड़िया कुमारी और शिमरण भारती शामिल हैं।

 

नियुक्ति पत्र जारी होने के बाद इन सभी ने 12 सितंबर 2026 को परिषद सचिवालय में योगदान किया था।

 

अब परिषद सचिवालय से उठ रहे हैं पांच बड़े सवाल

 

इस पूरे प्रकरण ने बिहार विधान परिषद की नियुक्ति प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यदि चयन प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता की आशंका थी, तो उसकी जांच सभी 64 नियुक्तियों के संदर्भ में समान रूप से क्यों नहीं हुई?

 

1. एक ही विज्ञापन से नियुक्त 64 कर्मचारियों में सिर्फ सात निजी सहायकों को ही री-एग्जाम के लिए क्यों चुना गया?

2. क्या बाकी 57 नियुक्तियों की चयन प्रक्रिया की जांच हुई है? यदि हुई है तो उसका परिणाम क्या है?

3. नियुक्ति पत्र जारी होने और योगदान के बाद क्या किसी कर्मचारी की नियुक्ति रद्द की गई? यदि नहीं, तो कार्यालय में प्रवेश पर रोक किस आदेश के तहत लगाई गई?

4. यदि बहाली प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और चयन प्रक्रिया से जुड़े लोगों पर क्या कार्रवाई होगी?

5. क्या भविष्य में बाकी संवर्गों के चयनित अभ्यर्थियों को भी दोबारा परीक्षा देने का आदेश दिया जा सकता है?

 

22 दिसंबर पर टिकी निगाहें, जवाबदेही तय होगी या बढ़ेगा विवाद?

 

बिहार विधान परिषद में नियुक्तियों का यह मामला अब महज सात निजी सहायकों की पुनर्परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता, प्रशासनिक निर्णयों की वैधता और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े सवाल भी जुड़ गए हैं।

 

एक तरफ सात अभ्यर्थी हाईकोर्ट में अपने पक्ष की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ कार्यालय में प्रवेश रोके जाने की घटना ने विवाद को और हवा दे दी है।

 

अब निगाहें 22 दिसंबर 2026 को होने वाली हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि परिषद सचिवालय अपने फैसले के पक्ष में क्या दलील देता है और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का क्या जवाब सामने आता है।

 

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर बहाली में गड़बड़ी थी तो 64 में से सिर्फ सात ही निशाने पर क्यों? और अगर नियुक्तियां वैध थीं, तो नियुक्ति पत्र लेकर योगदान करने वाले कर्मचारियों को दफ्तर के दरवाजे पर रोकने का अधिकार किसने दिया?

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