बिहार में टोपो भूमि की खरीद-बिक्री पर पूर्ण रोक, सरकार ने जारी किए सख्त निर्देश
- दाखिल-खारिज और लगान निर्धारण भी बंद, 14 जिलों में लागू होगा नया नियम
- सरकार ने टोपो भूमि को बताया सरकारी संपत्ति, भविष्य में नई नीति की संभावना
पटना। बिहार सरकार ने राज्य में भूमि संबंधी विवादों को रोकने और सरकारी जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक बड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने टोपो भूमि की खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज और लगान निर्धारण की प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगा दी है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने स्पष्ट किया है कि टोपो भूमि सरकारी संपत्ति मानी जाएगी और इस पर किसी भी व्यक्ति के निजी स्वामित्व को मान्यता नहीं दी जाएगी। विभाग की ओर से इस संबंध में राज्य के 14 जिलों के जिलाधिकारियों को आधिकारिक निर्देश जारी कर दिए गए हैं। साथ ही सभी अधीनस्थ कार्यालयों को भी आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने को कहा गया है। सरकार के इस निर्णय के बाद अब टोपो भूमि की रजिस्ट्री नहीं होगी और न ही ऐसी भूमि का दाखिल-खारिज किया जाएगा। इसके अलावा इन जमीनों पर लगान निर्धारण की प्रक्रिया भी पूरी तरह बंद रहेगी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने अपने निर्देश में कहा है कि भूमि सर्वेक्षण के बाद भी सरकार ने टोपो भूमि को लेकर कोई अंतिम नीतिगत निर्णय नहीं लिया है। ऐसी स्थिति में फिलहाल इस भूमि पर किसी भी प्रकार के निजी अधिकार को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार का मानना है कि यदि इस प्रकार की भूमि पर निजी स्वामित्व को अनुमति दी गई, तो भविष्य में बड़े पैमाने पर भूमि विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। गौरतलब है कि बिहार में वर्ष 2017 से 2022 तक टोपो भूमि की खरीद-बिक्री पर पहले से ही रोक लागू थी। हालांकि वर्ष 2022 में कुछ शर्तों के साथ इसकी खरीद-बिक्री की अनुमति दी गई थी। इसके बाद कई स्थानों पर खाता और खेसरा संख्या के स्थान पर केवल “टोपो” लिखकर भूमि की रजिस्ट्री की जाने लगी। इस प्रक्रिया को लेकर लगातार कानूनी और प्रशासनिक विवाद सामने आने लगे थे। इसी बीच बेगूसराय के जिलाधिकारी ने मार्च 2022 में राजस्व विभाग से इस विषय पर मार्गदर्शन मांगा था। इसके बाद विभाग ने पूरे मामले की समीक्षा की और अब नई दिशा-निर्देश जारी करते हुए सख्त निर्णय लिया है। प्रधान सचिव द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि 13 मई 1935 को प्रिवी काउंसिल द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार टोपो भूमि मूल रूप से सरकारी भूमि मानी गई है। इसके अलावा महाधिवक्ता और विधि विभाग से प्राप्त कानूनी राय में भी इसे सरकारी संपत्ति ही माना गया है। इसलिए किसी व्यक्ति या रैयत के स्वामित्व को वैध नहीं माना जा सकता। राज्य के जिन 14 जिलों में यह व्यवस्था लागू होगी उनमें पटना, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर, नालंदा, भोजपुर, सारण, सिवान, खगड़िया, गोपालगंज, बक्सर और पश्चिम चंपारण शामिल हैं। इनमें अधिकतर टोपो भूमि दियारा क्षेत्रों में स्थित है। हालांकि सारण ऐसा जिला है, जहां शहरी क्षेत्रों में भी टोपो भूमि पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार टोपो भूमि मुख्य रूप से उन क्षेत्रों को कहा जाता है, जो नदियों के मार्ग बदलने के कारण बनते हैं। नदी कटाव और बहाव के चलते कई बार नई भूमि उभर आती है, लेकिन उसका राजस्व सर्वेक्षण नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त ऐसी गैर-मजरुआ अथवा असर्वेक्षित भूमि, जिसका पुराना अभिलेख उपलब्ध नहीं होता, उसे भी टोपो भूमि की श्रेणी में रखा जाता है। यही कारण है कि इन जमीनों का स्पष्ट खाता और खेसरा विवरण नहीं होता और बाद में विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। सरकार के इस निर्णय को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इससे अवैध खरीद-बिक्री और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भूमि कब्जाने की घटनाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। फिलहाल सरकार ने टोपो भूमि पर पूर्ण रोक लागू कर दी है, लेकिन भविष्य में इस विषय पर अलग नीति बनाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है। तब तक इन जमीनों से संबंधित किसी भी प्रकार का लेन-देन या राजस्व प्रक्रिया पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।


