बिहार महिला कांग्रेस अध्यक्ष ने दिया इस्तीफा, हार की ली नैतिक जिम्मेदारी, खड़गे को भेजा पत्र
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस संगठन में उथल-पुथल जारी है। चुनावी नतीजों ने पार्टी को जहां गहरा आघात पहुंचाया है, वहीं अब उससे जुड़े नेताओं ने भी आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसी क्रम में बिहार महिला कांग्रेस की अध्यक्ष डॉ. सरवत जहाँ फातमा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा देकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। उन्होंने अपना त्यागपत्र अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भेजा है।
भावनात्मक पत्र में व्यक्त की पीड़ा
अपने इस्तीफे में डॉ. फातमा ने लिखा कि वह “भारी मन लेकिन दृढ़ संकल्प” के साथ यह निर्णय ले रही हैं। हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में पार्टी को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा, जहां कांग्रेस सिर्फ पाँच सीटों पर सिमट गई। इस हार को उन्होंने संगठनात्मक कमजोरी और महिला नेतृत्व को उचित अवसर न मिलने से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि महिला कांग्रेस की अध्यक्ष होने के नाते वे नैतिक रूप से जिम्मेदार महसूस करती हैं। इस बार कांग्रेस ने महिलाओं को मात्र 4% टिकट दिया, जिसे वे अत्यंत निराशाजनक बताती हैं। उनके अनुसार, महिला नेतृत्व को अवसर देने के कई प्रयास हुए, लेकिन चुनाव में यह लक्ष्य पूरी तरह विफल रहा।
संगठन के विस्तार की उपलब्धियों का किया उल्लेख
त्यागपत्र में डॉ. फातमा ने अपने 28 महीनों के कार्यकाल का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस अवधि में बिहार महिला कांग्रेस को बूथ स्तर से जिला स्तर तक मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए गए। इन कदमों में शामिल थे:
बूथ स्तर तक महिला पदाधिकारियों की नियुक्ति
नियमित प्रशिक्षण शिविर
घर-घर संपर्क अभियान
स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन और हस्तक्षेप
महिला सुरक्षा, शिक्षा और अधिकारों पर जागरूकता अभियान
उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से संगठन को मजबूती मिली, लेकिन चुनावी परिणाम सभी मेहनत को धुंधला कर देने वाले साबित हुए।
कांग्रेस की विरासत का भी किया उल्लेख
अपने पत्र में उन्होंने कांग्रेस के इतिहास का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी, स्वर्गीय राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने महिलाओं को राजनीति में सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महिला कांग्रेस हमेशा से इस विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास करती रही है। उनके अनुसार, यही प्रेरणा उन्हें संगठन के साथ जोड़कर रखती आई, और आगे भी वे पार्टी के सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति समर्पित रहेंगी।
चुनावी हार और कांग्रेस संगठन में मची हलचल
बिहार के इस चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन ने पार्टी को झकझोर दिया है। वर्ष 2020 में 19 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार पांच पर सिमटी रह गई। इतना ही नहीं, प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और विधायक दल के नेता शकील अहमद खान भी अपनी-अपनी सीट नहीं बचा सके। चुनावी हार के बाद कांग्रेस के भीतर असंतोष गहराने लगा है। कई वरिष्ठ नेता खुले तौर पर हाईकमान की रणनीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी संगठन चुनाव से पहले मतदाताओं से जुड़ने में नाकाम रहा। इसी माहौल में महिला कांग्रेस अध्यक्ष का इस्तीफा चर्चा का बड़ा कारण बन गया है। इसे पार्टी की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट की ओर संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
आगे की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
डॉ. सरवत जहाँ फातमा का इस्तीफा कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि संगठन में महिला नेतृत्व का प्रतिनिधित्व पहले से ही सीमित है। अब सवाल खड़ा हो रहा है कि महिला कांग्रेस के भीतर नई नेतृत्व संरचना किसे सौंपी जाएगी और क्या नया नेतृत्व संगठन को वापस उभरने में सफल होगा। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती आने वाले वर्षों में जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करना है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि पार्टी को पुनर्जीवित होना है तो उसे न सिर्फ नई रणनीति बनानी होगी, बल्कि युवा और महिला नेतृत्व को अधिक महत्व देना होगा। बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस पहले से ही संकट के दौर में है। ऐसे में महिला कांग्रेस अध्यक्ष का इस्तीफा पार्टी के लिए एक और गंभीर संकेत है कि संगठन को आत्ममंथन के साथ-साथ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। डॉ. सरवत जहाँ फातमा का इस्तीफा न केवल व्यक्तिगत नैतिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन है बल्कि यह कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में मौजूद चुनौतियों को भी उजागर करता है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस संकट से कैसे उबरती है और क्या वह महिला नेतृत्व को सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाती है।


