बिहार में 1 से 10 मई तक हड़ताल पर रहेंगी आशा कार्यकर्ता, स्वास्थ्य व्यवस्था पर होगा संकट, वेतन बकाया से बढ़ी मुश्किलें
- नौ महीने से भुगतान नहीं, इलाज और परिवार चलाना हुआ कठिन
- राजस्व विभाग की हड़ताल भी जारी, नई सरकार के सामने कई मोर्चों पर चुनौती
पटना। बिहार में नई सरकार के गठन के बाद प्रशासनिक चुनौतियां लगातार सामने आ रही हैं। राज्य में करीब एक लाख आशा कार्यकर्ता पिछले कई महीनों से वेतन और प्रोत्साहन राशि नहीं मिलने के कारण गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि इन कार्यकर्ताओं ने एक मई से दस मई तक हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है। इसका सीधा असर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। खगड़िया की आशा कार्यकर्ता कविता बताती हैं कि उन्हें पिछले आठ महीनों से कोई भुगतान नहीं मिला है और अब यह नौवां महीना चल रहा है। उन्होंने बताया कि उन्हें मधुमेह, थायराइड और अंडाशय में सिस्ट जैसी गंभीर बीमारियां हैं, लेकिन पैसे के अभाव में इलाज तक संभव नहीं हो पा रहा है। उनके पति किसान हैं और चार बेटियों तथा दो बेटों का पालन-पोषण करना मुश्किल हो गया है। इसी तरह बेगूसराय की आशा कार्यकर्ता रीना ने बताया कि उनकी नसों में सूजन है और गर्भाशय से जुड़ी समस्या भी है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण इलाज नहीं करा पा रही हैं। यह समस्या केवल कुछ महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य की आशा कार्यकर्ताओं की है। ये कार्यकर्ता सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ मानी जाती हैं और गांव-गांव जाकर टीकाकरण, जांच और जागरूकता का काम करती हैं। इसके बावजूद अगस्त 2025 से इनके प्रोत्साहन और मासिक भुगतान की राशि बकाया है, जिससे इनके जीवन पर गंभीर असर पड़ रहा है। मुंगेर जिले की आशा कार्यकर्ता किरण कुमारी ने बताया कि उनके पति की बिजली के झटके से मौत हो गई थी, लेकिन उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 से उनका भुगतान बकाया है और बार-बार आवेदन देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, पैसा मांगने पर नौकरी से हटाने की धमकी दी जाती है। आशा कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगों में बकाया राशि का तत्काल भुगतान, सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष करना, सेवानिवृत्ति पैकेज और पेंशन लागू करना शामिल है। बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ की अध्यक्ष शशि यादव ने कहा कि इतने लंबे समय तक भुगतान न होने से इन कम वेतन पाने वाली महिलाओं के लिए जीवन यापन करना बेहद कठिन हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि 17 अप्रैल को एक दिन की हड़ताल के बाद एक-दो महीने का भुगतान किया गया था, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। दूसरी ओर, राज्य में भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की हड़ताल भी जारी है। हालांकि सरकार ने निलंबित कर्मियों का निलंबन वापस ले लिया है, इसके बावजूद हड़ताल समाप्त नहीं हुई है। बिहार राजस्व सेवा के 47 अधिकारियों को निलंबित किया गया था और करीब 900 कर्मचारी अभी भी हड़ताल पर हैं। इसके कारण अंचल कार्यालयों में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस हड़ताल का असर आम लोगों पर भी पड़ रहा है। जमीन से जुड़े कार्य जैसे दाखिल-खारिज, पैमाइश और रसीद कटाने जैसे जरूरी काम ठप पड़े हैं। इसके साथ ही जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान अंचल कार्यालयों को दुरुस्त करने और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही थी। हालांकि वर्तमान स्थिति उनके सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी है। एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली आशा कार्यकर्ता हड़ताल पर जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजस्व विभाग की हड़ताल से प्रशासनिक कार्य बाधित हो रहे हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि नई सरकार उनकी मांगों पर विचार करेगी और जल्द ही समाधान निकलेगा। वहीं आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जल्द भुगतान नहीं किया गया तो वे अपने आंदोलन को और तेज करेंगी। बिहार में हड़तालों की यह स्थिति नई सरकार के लिए पहली बड़ी परीक्षा बनकर उभरी है। यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो इसका व्यापक असर न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा, बल्कि आम जनता को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।


