बांकीपुर उपचुनाव या सम्राट सरकार पर बढ़ता राजनीतिक दबाव? एक कदम आगे तो तीन कदम पीछे भरत तिवारी इनकाउंटर से लेकर छात्र आंदोलन तक..

पटना।नीट पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मुकदमे वापस लेने और गिरफ्तार लोगों की रिहाई का बिहार सरकार का फैसला कई सवाल खड़े कर रहा है। इसे केवल बांकीपुर उपचुनाव की राजनीति तक सीमित कर देना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। चुनाव निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ छात्र आंदोलन के दोबारा उग्र होने और पूरे राज्य में राजनीतिक मुद्दा बनने की आशंका भी सरकार के सामने रही होगी।

फैसले का समय सबसे अधिक चर्चा का विषय है। बांकीपुर में 30 जुलाई को मतदान होना है और इस चुनाव में प्रशांत किशोर स्वयं मैदान में हैं। युवा और छात्र इस उपचुनाव के प्रमुख मतदाता वर्गों में शामिल हैं। विपक्ष लगातार गिरफ्तार छात्रों की रिहाई को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा था। ऐसे में मतदान से ठीक पहले सरकार का यह निर्णय चुनावी रणनीति से पूरी तरह अलग दिखाई नहीं देता।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष पुलिस एवं प्रशासन का मनोबल है।

यदि प्रदर्शन के दौरान 164 पुलिसकर्मी और अधिकारी घायल हुए, 14 सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा, एक बीडीओ ने अपनी आंख गंवाई तथा आईजी और एसपी स्तर के अधिकारी भी घायल हुए, तो यह जरूरी है कि सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा के आरोप झेल रहे लोगों के बीच स्पष्ट अंतर करे।

अगर राहत केवल उन छात्रों तक सीमित है जिन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार किया गया था, तो इसे लोकतांत्रिक संवेदनशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि पुलिस पर हमला करने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अधिकारियों को गंभीर रूप से घायल करने के आरोपियों को भी बिना किसी अलग जांच के समान राहत मिलती है, तो इससे अलग संदेश जाएगा।

ऐसी स्थिति में पुलिस बल के भीतर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि जिस कानून को लागू करने के दौरान वे घायल हुए, उसी कानून के तहत दर्ज मुकदमे यदि राजनीतिक निर्णय से वापस हो जाएं, तो भविष्य में कानून लागू करने का उनका मनोबल कितना प्रभावित होगा।

यह केवल पुलिस का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है।

दूसरी ओर, यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऐसा फैसला केवल बिहार में नहीं हुआ है। असम सरकार ने भी इसी प्रकार प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में राहत देने और गिरफ्तार लोगों को रिहा करने की घोषणा की है। इसलिए इसे केवल बिहार या केवल बांकीपुर की चुनावी राजनीति तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। यह छात्र आंदोलनों के बढ़ते दबाव के सामने सरकारों के नरम रुख का संकेत भी हो सकता है।

फिर भी, बिहार में बांकीपुर उपचुनाव की टाइमिंग इस निर्णय को राजनीतिक बहस से अलग नहीं होने देती।

असल मुद्दा माफी नहीं, बल्कि माफी की सीमा है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को राहत देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि हिंसा के गंभीर आरोपों वाले मामलों को भी उसी दायरे में शामिल किया जाता है, तो सरकार को स्पष्ट करना होगा कि कानून और जवाबदेही की सीमा आखिर कहां तय होगी।

बिहार सरकार के आदेश में 26 जुलाई की शाम 6 बजे तक प्रदर्शन में शामिल लोगों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई रोकने, एफआईआर, शिकायत और नोटिस वापस लेने तथा गिरफ्तार लोगों को रिहा करने की बात व्यापक रूप से कही गई है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी और राजनीतिक प्रश्न यही है कि क्या हिंसा और गंभीर अपराधों के आरोप वाले मामलों को इस राहत से अलग रखा गया है या नहीं।

बांकीपुर में 30 जुलाई को होने वाला मतदान और चुनावी मैदान में प्रशांत किशोर की मौजूदगी इस पूरे फैसले को राजनीतिक दृष्टि से और अधिक चर्चा का विषय बना देती है।

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