भरत तिवारी एनकाउंटर:-सबसे बड़ा सवाल: जीवित गिरफ्तारी संभव थी, एसटीएफ-एटीएस के पास थी फुल बॉडी बुलेट प्रूफ,दूसरे दिन इनकाउंटर का आदेश किसने दिया..साजिश के पीछे कौन?

पटना।(बनबिहारी)भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र के भरत तिवारी इनकाउंटर मामले को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। मामले की निष्पक्ष और गहन जांच की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि यदि पुलिस चाहती, तो भरत तिवारी को जीवित गिरफ्तार किया जा सकता था। हालांकि, इस पूरे प्रकरण के तथ्यों और पुलिस के आधिकारिक पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

मिली जानकारी के अनुसार, भरत तिवारी के परिजनों ने पुलिस को सूचना दी थी कि वह एक पिस्टल के साथ तनावपूर्ण स्थिति में है। 16 जून को पुलिस उसके पास पहुंची और उसे समझाने का प्रयास किया। उस दिन पुलिस ने कोई गोलीबारी नहीं की तथा बाद में जारी प्रेस विज्ञप्ति में युवक को मानसिक रूप से अस्थिर बताते हुए हथियार बरामद करने के प्रयास की बात कही थी।

17 जून को मामले ने नया मोड़ लिया, जब बड़ी संख्या में पुलिस बल और एसटीएफ की मौजूदगी के बीच भरत तिवारी द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद पुलिस कार्रवाई में उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद कई गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

वे पांच प्रमुख बिंदु जिन पर उठ रहे हैं सवाल

1. पहले दिन पुलिस ने खतरा नहीं माना 16 जून को पुलिस भरत तिवारी के संपर्क में पहुंची थी, लेकिन उस समय उस पर गोली नहीं चलाई गई। इससे सवाल उठ रहा है कि यदि तत्काल जान का बड़ा खतरा नहीं था, तो अगले दिन ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि घातक बल प्रयोग आवश्यक हो गया।

2. विशेष सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता सवाल उठाने वालों का कहना है कि बिहार पुलिस, एसटीएफ और अन्य विशेष इकाइयों के पास बुलेटप्रूफ सुरक्षा उपकरण उपलब्ध होते हैं। ऐसे में जोखिम कम करते हुए गिरफ्तारी का प्रयास किया जा सकता था।

3. पर्याप्त समय और संसाधन घटना के दौरान पुलिस के पास लगभग 48 घंटे का समय था। आलोचकों का तर्क है कि आधुनिक तकनीक, बातचीत, मनोवैज्ञानिक परामर्श और रणनीतिक घेराबंदी जैसे विकल्पों पर अधिक जोर दिया जा सकता था।

4. कानूनी कार्रवाई का विकल्प विश्लेषकों का मानना है कि यदि भरत तिवारी को जीवित गिरफ्तार किया जाता, तो उसके विरुद्ध आर्म्स एक्ट और अन्य संबंधित धाराओं में मुकदमा चलाकर न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा सकती थी।

5. सरेंडर के दावे सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि अंतिम क्षणों में भरत तिवारी ने हथियार छोड़ दिया था। यदि यह दावा सही है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है कि उस समय की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं।

निष्पक्ष जांच की मांग

घटना के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि पुलिस कार्रवाई की पूरी श्रृंखला में क्या-क्या निर्णय लिए गए और किस स्तर पर लिए गए। आलोचकों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष न्यायिक या स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी और क्या सभी वैकल्पिक उपाय समाप्त हो चुके थे।

फिलहाल भरत तिवारी इनकाउंटर मामला बिहार की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में चर्चा का विषय बना हुआ है। मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह परिस्थितियों के अनुरूप थी या फिर इसमें किसी स्तर पर चूक अथवा अन्य पहलुओं की जांच की आवश्यकता है।

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