बिहार में बाल विवाह और किशोर मातृत्व अब भी बड़ी चुनौती, हर दसवीं गर्भवती महिला नाबालिग

  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े, 35 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले
  • कम उम्र में गर्भधारण से बढ़ रहा स्वास्थ्य जोखिम, प्रसव पूर्व नियमित जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या भी कम

पटना। बिहार में बाल विवाह और किशोरावस्था में मातृत्व की समस्या अब भी गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के छठे चरण की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में मातृत्व ग्रहण करने वाली महिलाओं में लगभग 11 प्रतिशत किशोरियां शामिल हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक दस गर्भवती महिलाओं में एक लड़की ऐसी है, जिसकी आयु वयस्क होने की निर्धारित सीमा से कम है और जो कम उम्र में ही मातृत्व की जिम्मेदारियां निभाने को विवश है। सर्वेक्षण में यह भी उजागर हुआ है कि बिहार में बाल विवाह की समस्या अब भी व्यापक रूप से मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 35 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष की कानूनी आयु पूरी होने से पहले कर दी जाती है। वहीं लगभग 29.3 प्रतिशत लड़कों का विवाह भी 21 वर्ष की निर्धारित आयु से पहले हो रहा है। हालांकि पिछले पांच वर्षों की तुलना में इन आंकड़ों में कुछ गिरावट दर्ज की गई है, फिर भी स्थिति संतोषजनक नहीं मानी जा सकती। रिपोर्ट के अनुसार पांच वर्ष पहले बिहार में 40.8 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो जाता था। इसी प्रकार 30.5 प्रतिशत लड़कों की शादी 21 वर्ष से कम आयु में कर दी जाती थी। आंकड़ों में सुधार के संकेत अवश्य मिले हैं, लेकिन किशोरियों के मां बनने की दर में उल्लेखनीय कमी नहीं आ पाई है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक संगठनों के लिए यह विषय चिंता का कारण बना हुआ है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में गर्भधारण मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। श्रीकृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. विभा वर्मा के अनुसार किशोरावस्था में गर्भवती होने वाली लड़कियों में रक्त की कमी सबसे सामान्य और गंभीर समस्या होती है। कई मामलों में उनके शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर अत्यंत कम पाया जाता है, जिससे प्रसव के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कम उम्र में मातृत्व ग्रहण करने वाली किशोरियों में उच्च रक्तचाप, शरीर में सूजन, समय से पूर्व प्रसव, नवजात शिशु की मृत्यु तथा प्रसव संबंधी अन्य जटिलताओं का खतरा अधिक होता है। इसके अतिरिक्त किशोरियां स्वास्थ्य, पोषण और गर्भावस्था संबंधी आवश्यक सावधानियों के प्रति अपेक्षाकृत कम जागरूक होती हैं, जिससे उनकी स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट में गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य जांच को लेकर भी चिंताजनक स्थिति सामने आई है। बिहार में केवल 38 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भावस्था के दौरान आवश्यक चार स्वास्थ्य जांच पूरी करा रही हैं। आंकड़ों के अनुसार लगभग 64 प्रतिशत महिलाएं पहली जांच के लिए स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचती हैं, लेकिन बाद की जांचों में यह संख्या लगातार कम होती जाती है। चौथी और अंतिम जांच तक पहुंचते-पहुंचते यह अनुपात लगभग आधा रह जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच बेहद आवश्यक होती है। इससे गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु की स्वास्थ्य स्थिति का समय-समय पर मूल्यांकन किया जा सकता है तथा संभावित जटिलताओं का समय रहते उपचार संभव हो पाता है। नियमित जांच की कमी कई बार गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बन जाती है। हालांकि रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। बच्चों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में बिहार ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। सर्वेक्षण के अनुसार बच्चों में बौनेपन की समस्या में कमी आई है। वर्तमान में 35.6 प्रतिशत बच्चे इस समस्या से प्रभावित हैं, जबकि पांच वर्ष पहले यह आंकड़ा 43 प्रतिशत था। यह सुधार पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं में हुए प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाल विवाह की रोकथाम, किशोरियों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच बढ़ाने से स्थिति में और सुधार लाया जा सकता है। साथ ही समाज में जागरूकता बढ़ाकर कम उम्र में विवाह और मातृत्व की परंपरा को समाप्त करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि बिहार में सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया जारी है, लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

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