बिहार में एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया को बताया संवैधानिक
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- निष्पक्ष और शुद्ध मतदाता सूची तैयार करना निर्वाचन आयोग का अधिकार
- विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया पर विपक्ष ने उठाए सवाल, लाखों नाम कटने के बाद बिहार की राजनीति में बढ़ी बहस
नई दिल्ली/पटना। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चल रही कानूनी और राजनीतिक बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग द्वारा कराई गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को वैध, संवैधानिक और आवश्यक करार देते हुए साफ कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा कि विशेष परिस्थितियों में निर्वाचन आयोग अलग प्रक्रिया अपनाने के लिए अधिकृत है और इसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे मतदाता सूची को शुद्ध एवं त्रुटिरहित बनाए रखने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया का उद्देश्य लोकतंत्र की मूल भावना को मजबूत करना और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। न्यायालय ने माना कि यह प्रक्रिया संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुरूप है तथा इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं की गई है। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू होने के बाद कई याचिकाएं दायर कर इसे चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि यह सामान्य मतदाता संशोधन प्रक्रिया से अलग है और इससे लाखों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपनी वैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर कार्य किया है। अदालत ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया किसी लोकतांत्रिक अधिकार को बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए अपनाई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पांच महत्वपूर्ण सवालों पर विस्तार से टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का अधिकार है और इसे अधिकारों का अतिक्रमण नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना संविधान में निहित स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लक्ष्य से सीधे जुड़ा हुआ है। अदालत ने आयोग द्वारा अपनाए गए उपायों को आनुपातिक और व्यावहारिक बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए। पहले इस प्रक्रिया में 11 प्रकार के दस्तावेजों को मान्यता दी गई थी, लेकिन बाद में अदालत के निर्देश पर आधार कार्ड को भी पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का नहीं, बल्कि पहचान का प्रमाण है। इसके बावजूद मतदाता पहचान सत्यापन में इसका उपयोग किया जा सकता है। जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके संबंध में भी अदालत ने अहम आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को चार सप्ताह के भीतर संबंधित सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए। संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देकर अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए और यदि वे भारतीय नागरिक पाए जाते हैं तो उनके नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए जाएं। निर्वाचन आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की अंतिम सूची 1 अक्टूबर 2025 को जारी की थी। इस सूची के बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या लगभग छह प्रतिशत घटकर 7.42 करोड़ रह गई। अंतिम सूची से 69 लाख 29 हजार नाम हटाए गए, जबकि 21 लाख 53 हजार नए मतदाताओं को जोड़ा गया। आयोग के अनुसार हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाता शामिल थे। पटना जिले में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई, जबकि सारण जिले में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। निर्वाचन आयोग के अनुसार विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य फर्जी, दोहराए गए और स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से हटाना था। इस प्रक्रिया के तहत लगभग 7.24 करोड़ मतदाताओं से फॉर्म प्राप्त किए गए और 99.8 प्रतिशत सत्यापन कार्य पूरा किया गया। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने की कोशिश की गई। विपक्ष का कहना है कि यदि वर्षों से चुनाव इन्हीं मतदाता सूचियों के आधार पर होते रहे हैं तो अचानक इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। साथ ही यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इतनी जल्दबाजी में यह प्रक्रिया क्यों शुरू की गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत मिली है। वहीं बिहार की राजनीति में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने के आसार हैं। राजनीतिक दलों की नजर अब आगामी चुनाव और नई मतदाता सूची के प्रभाव पर टिकी हुई है।


