बिहार के स्कूलों में बदलेगा पढ़ाई का माहौल, प्रयोगशाला और पठन क्लब पर विशेष जोर

  • सप्ताह में तीन दिन प्रयोगात्मक कक्षाएं अनिवार्य, समूह चर्चा और परियोजना कार्य को बढ़ावा
  • छात्रों को इंटरनेट माध्यम से दूर रखने और पठन संस्कृति विकसित करने के निर्देश

पटना। बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में अब माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने के उद्देश्य से नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से सभी प्रधानाध्यापकों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि स्कूलों में पढ़ाई का माहौल अधिक सक्रिय, रचनात्मक और सहभागितापूर्ण बनाया जाए। हाल ही में किए गए निरीक्षण के दौरान कई सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक वातावरण संतोषजनक नहीं पाया गया, जिस पर शिक्षा विभाग ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। इसी के मद्देनजर जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (माध्यमिक) सैफुर रहमान ने सभी स्कूलों को सख्त निर्देश जारी करते हुए परिसर की स्वच्छता और सकारात्मक वातावरण सुनिश्चित करने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि स्वच्छ और प्रेरणादायक माहौल ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आधारशिला होता है। नए निर्देशों के अनुसार अब स्कूलों में प्रयोगशालाओं के उपयोग को अनिवार्य बनाया गया है। पाया गया कि अधिकांश विद्यालयों में उपलब्ध प्रयोगशालाओं का उपयोग बहुत कम हो रहा था। इस स्थिति को सुधारने के लिए अब सप्ताह में कम से कम तीन दिन प्रयोगात्मक कक्षाएं आयोजित करना आवश्यक होगा। इन कक्षाओं के संचालन के लिए प्रत्येक विद्यालय में एक नोडल शिक्षक नियुक्त किया जाएगा, जो प्रयोगात्मक गतिविधियों का संपूर्ण विवरण एक डायरी में दर्ज करेगा। इस डायरी में प्रत्येक प्रयोग का विषय, प्रक्रिया और परिणाम का उल्लेख किया जाएगा, जिसे प्रधानाध्यापक नियमित रूप से अद्यतन करेंगे। शिक्षण पद्धति में भी व्यापक बदलाव लाने पर बल दिया गया है। अब छात्रों को केवल कक्षा में बैठकर व्याख्यान सुनने तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि उन्हें समूह चर्चा, परियोजना कार्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विज्ञान प्रदर्शनी, भूमिका निर्वहन और अन्य प्रयोगात्मक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसका उद्देश्य छात्रों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना है। शिक्षकों को निर्देश दिया गया है कि वे छात्रों को प्रश्न पूछने और स्वयं उत्तर खोजने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे छात्रों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे विषयों को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे। विभाग का मानना है कि सक्रिय सहभागिता आधारित शिक्षण से छात्रों की सीखने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। इसके साथ ही विद्यालयों में पुस्तकालय व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। निर्देशों के अनुसार, पुस्तकालयों में पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकों के अलावा समाचार पत्र और पत्रिकाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। छात्रों में नियमित पठन की आदत विकसित करने के लिए सभी स्कूलों में पठन क्लब की स्थापना की जाएगी। प्रत्येक पठन क्लब के लिए भी एक नोडल शिक्षक नियुक्त किया जाएगा, जो पठन गतिविधियों का संचालन और निगरानी करेगा। जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने छात्रों को इंटरनेट माध्यम के अत्यधिक उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति भी आगाह किया है। शिक्षकों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे बच्चों को इंटरनेट के अनावश्यक उपयोग से दूर रहने और अपने समय का सदुपयोग पढ़ाई तथा रचनात्मक गतिविधियों में करने के लिए प्रेरित करें। इन सभी प्रयासों का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को केवल सैद्धांतिक न रखकर उसे व्यावहारिक और जीवनोपयोगी बनाना है। शिक्षा विभाग को उम्मीद है कि इन नए दिशा-निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार होगा और छात्रों को बेहतर सीखने का अवसर मिलेगा। बिहार में शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि इन निर्देशों का सही तरीके से पालन किया जाता है, तो आने वाले समय में विद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण निश्चित रूप से अधिक सशक्त और प्रेरणादायक बन सकेगा।

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