न्याय को लेकर सवाल उठाते हुए केजरीवाल का बड़ा फैसला, जज के बहिष्कार का ऐलान

  • सत्याग्रह का हवाला देकर अदालत में पेश न होने की घोषणा
  • हितों के टकराव और निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल ने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा और विवादास्पद कदम उठाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ का बहिष्कार करने का ऐलान किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कथित शराब घोटाले से जुड़े मामले में वे न तो स्वयं अदालत में पेश होंगे और न ही अपने किसी अधिवक्ता को भेजेंगे। उन्होंने अपने इस निर्णय को सत्याग्रह बताते हुए इसे महात्मा गांधी के बताए मार्ग का अनुसरण बताया है।  सोमवार सुबह जारी एक वीडियो संदेश में केजरीवाल ने कहा कि वे ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां हार और जीत से अधिक महत्वपूर्ण सही और गलत का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं जब व्यक्ति को कठिन रास्ता चुनना पड़ता है और उन्होंने भी वही रास्ता चुना है। उनके अनुसार यह सिर्फ उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था में आम लोगों के विश्वास से जुड़ा विषय है। केजरीवाल ने अपने वक्तव्य में आरोप लगाया कि उन्हें झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजा गया और एक निर्वाचित सरकार को गिराने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि बाद में अदालत ने उन्हें निर्दोष माना और जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। इसी संदर्भ में जब मामला उच्च न्यायालय में पहुंचा, तो उन्हें न्याय मिलने को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने संदेह के पीछे दो मुख्य कारण बताए। पहला, उन्होंने कहा कि जिस विचारधारा की सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की, उससे जुड़े मंचों पर संबंधित न्यायाधीश की उपस्थिति को लेकर उन्हें आपत्ति है। दूसरा, उन्होंने हितों के टकराव का मुद्दा उठाते हुए कहा कि मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी और केंद्र सरकार पक्ष में हैं, जबकि न्यायाधीश के परिजनों का संबंध सरकारी अधिवक्ता पैनल से बताया जाता है। उनके अनुसार इससे निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े होते हैं। हालांकि, केजरीवाल ने यह भी कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास और सम्मान है तथा उनका किसी न्यायाधीश से व्यक्तिगत विरोध नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था को चुनौती देना नहीं बल्कि न्याय की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने पहले न्यायाधीश से स्वयं को मामले से अलग करने का अनुरोध किया था, लेकिन उनकी अपील अस्वीकार कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि सत्याग्रह का अर्थ शांतिपूर्ण और विनम्र तरीके से अपनी बात रखना है और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना है, न कि किसी के प्रति द्वेष रखना। केजरीवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मामले में अपने अधिवक्ता को भी अदालत में पेश नहीं होने देंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में कोई अन्य मामला हो, जिसमें केंद्र सरकार या संबंधित अधिवक्ता शामिल न हों, तो वे उसी न्यायाधीश की अदालत में पेश हो सकते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे आगे उच्चतम न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन यह कदम पूरी सावधानी और सम्मान के साथ उठाया जाएगा। राजनीतिक और कानूनी हलकों में इस फैसले को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न्यायिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन पर नए सवाल खड़े करता है। वहीं समर्थकों का कहना है कि यह पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर उठाया गया कदम है। यह घटनाक्रम न्याय व्यवस्था में विश्वास, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर एक नई बहस को जन्म देता है। आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा और इसके कानूनी प्रभावों पर सबकी नजर बनी रहेगी।

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