पांच राज्यों के चुनाव के बाद देश में बढ़ेगी पेट्रोल और डीजल की कीमतें, 18 रुपए पेट्रोल और 35 रुपए महंगा होगा डीजल

  • तेल कंपनियों पर बढ़ता घाटा, चुनाव के बाद दाम बढ़ने की संभावना
  • आयात निर्भरता और चालू खाता घाटे पर बढ़ता दबाव

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि का असर अब भारत के आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। विदेशी ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं, जबकि कच्चे तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इस असंतुलन के कारण तेल विपणन कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों में चुनाव समाप्त होने के बाद कंपनियां ईंधन के दामों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान स्थिति में तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये और डीजल पर करीब 35 रुपये का नुकसान हो रहा है। बीते महीने जब कच्चे तेल की कीमतें अपने उच्चतम स्तर पर पहुंची थीं, तब सरकारी तेल कंपनियां प्रतिदिन लगभग 2,400 करोड़ रुपये का घाटा झेल रही थीं। हालांकि, सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क में 10 रुपये की कटौती किए जाने के बाद यह नुकसान घटकर करीब 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है। इसके बावजूद कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से तेल कंपनियों का घाटा लगभग 6 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ जाता है। भारत अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं। इसमें से करीब 45 प्रतिशत तेल मध्य पूर्व के देशों से और 35 प्रतिशत रूस से आयात किया जाता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव डालता है। खासतौर पर चालू खाता घाटा, यानी देश के आयात और निर्यात के बीच का अंतर, तेजी से बढ़ने की आशंका है। अनुमान है कि वर्ष 2026 की पहली तिमाही में यह घाटा बढ़कर 20 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ेगा और महंगाई में भी इजाफा हो सकता है। सरकारी राजस्व के लिहाज से भी स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क का योगदान लगातार घटता जा रहा है। वित्त वर्ष 2017 में जहां यह कुल राजस्व का 22 प्रतिशत था, वहीं अब यह घटकर केवल 8 प्रतिशत रह गया है। यदि सरकार पूरी तरह से उत्पाद शुल्क समाप्त भी कर दे, तो भी मौजूदा हालात में तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर नजर डालें तो अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत अगस्त 2022 के बाद पहली बार 4 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच गई है। इसके अलावा भारत के पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में बढ़ोतरी की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में इसी तरह वृद्धि जारी रही, तो भारत में भी ईंधन के दाम बढ़ाना अनिवार्य हो जाएगा। इससे परिवहन लागत में वृद्धि होगी, जिसका सीधा असर खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। कुल मिलाकर, आने वाले समय में आम जनता को महंगाई के एक और झटके के लिए तैयार रहना पड़ सकता है।

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