ईरान युद्ध को लेकर ट्रम्प और नेतन्याहू में बढ़े मतभेद, दुनिया भर में बढ़ी चिंता
- अमेरिका बातचीत के पक्ष में, इजराइल चाहता है ईरान पर सैन्य कार्रवाई जारी रहे
- होर्मुज संकट, युद्ध विरोधी प्रदर्शन और वैश्विक महंगाई की आशंका से बढ़ा तनाव
नई दिल्ली। ईरान को लेकर अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर अलग-अलग राय सामने आई है। एक ओर इजराइल चाहता है कि ईरान पर हमले जारी रहें, वहीं दूसरी ओर ट्रम्प फिलहाल बातचीत और समझौते को प्राथमिकता देने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में जारी तनाव को और बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार दोनों नेताओं के बीच मंगलवार को लगभग एक घंटे तक टेलीफोन पर बातचीत हुई। बताया गया कि नेतन्याहू ने ट्रम्प से कहा कि ईरान पर प्रस्तावित हमले रोकना एक बड़ी गलती होगी और सैन्य कार्रवाई जारी रखनी चाहिए। हालांकि ट्रम्प ने संकेत दिया कि वह अभी कूटनीतिक समाधान को मौका देना चाहते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने ईरान पर एक नए लक्षित हमले की तैयारी भी कर ली थी। इस अभियान को “ऑपरेशन स्लेजहैमर” नाम दिया गया था। बताया गया कि ट्रम्प ने रविवार को नेतन्याहू को इस सैन्य अभियान की जानकारी दी थी, लेकिन करीब 24 घंटे बाद उन्होंने अचानक घोषणा कर दी कि फिलहाल इस हमले को रोक दिया गया है। ट्रम्प ने कहा कि कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों की अपील के बाद यह फैसला लिया गया। इस बीच अमेरिकी संसद में भी ईरान युद्ध को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सीनेट में राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव 50 के मुकाबले 47 मतों से पारित हो गया। खास बात यह रही कि चार रिपब्लिकन सांसदों ने भी ट्रम्प के खिलाफ मतदान किया। यदि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है तो ईरान के खिलाफ किसी भी लंबे सैन्य अभियान के लिए ट्रम्प को कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। उधर ट्रम्प ने अमेरिका की तटरक्षक अकादमी में दिए भाषण में दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायुसेना लगभग समाप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि अब सवाल केवल यह है कि अमेरिका आगे पूरी कार्रवाई करेगा या ईरान समझौते का रास्ता चुनेगा। दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने दावा किया है कि पिछले 24 घंटों में 26 जहाज ईरान की अनुमति के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे हैं। इनमें तेल टैंकर और व्यावसायिक जहाज शामिल थे। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति होती है। संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी तेल कंपनी ने भी घोषणा की है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को दरकिनार करने वाली नई तेल पाइपलाइन का लगभग 50 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। हाल के दिनों में फुजैराह तेल केंद्र पर ड्रोन हमलों की घटनाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संस्था ने भी इस संकट को लेकर चेतावनी जारी की है। संस्था ने कहा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट बढ़ती है तो दुनिया में खाद्य संकट और महंगाई की स्थिति गंभीर हो सकती है। संस्था ने विभिन्न देशों से वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग तैयार करने की अपील की है। अमेरिका के भीतर भी ईरान युद्ध का विरोध बढ़ता जा रहा है। राजधानी वॉशिंगटन में अमेरिकी संसद भवन के बाहर पूर्व सैनिकों और युद्ध विरोधी संगठनों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने ट्रम्प की सैन्य नीति का विरोध करते हुए कहा कि अमेरिका को एक और लंबे युद्ध में नहीं उलझना चाहिए। इस प्रदर्शन में कई पूर्व सैनिकों के साथ डेमोक्रेट सांसद टैमी डकवर्थ और टिम केन भी शामिल हुए। इधर ईरान ने दो लोगों को फांसी दिए जाने की पुष्टि की है। ईरानी समाचार संस्था के अनुसार दोनों पर देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने और एक आतंकी संगठन से जुड़े होने का आरोप था। अधिकारियों ने कहा कि दोनों पर सशस्त्र विद्रोह, गोलीबारी और हत्या की कोशिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। इस बीच अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान के खिलाफ चलाए गए “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” में अमेरिका को भारी सैन्य नुकसान हुआ। रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान में 42 अमेरिकी विमान और ड्रोन नष्ट या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें एफ-35, एफ-15ई स्ट्राइक ईगल और ए-10 थंडरबोल्ट जैसे लड़ाकू विमान भी शामिल बताए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका और इजराइल का उद्देश्य केवल ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को कमजोर करना नहीं था, बल्कि वहां सत्ता परिवर्तन की योजना भी बनाई गई थी। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।


