बिहार में भीषण गर्मी और सूखे का खतरा, सुपर अल नीनो से बढ़ी चिंता

  • मई से जुलाई के बीच मौसम में बड़े बदलाव के संकेत, मानसून में 20 प्रतिशत कम बारिश की आशंका
  • कृषि और जनजीवन पर पड़ सकता है गंभीर असर, मौसम वैज्ञानिकों ने दी सतर्क रहने की सलाह

पटना। बिहार इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है और आने वाले दिनों में हालात और कठिन होने की आशंका जताई जा रही है। राज्य के कई जिलों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जबकि मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मई के अंत तक कई इलाकों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है। बढ़ती गर्मी के बीच अब सुपर अल नीनो का खतरा भी सामने आ गया है, जिसने मौसम वैज्ञानिकों और किसानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुपर अल नीनो की स्थिति मजबूत होती है तो बिहार में सामान्य से काफी कम बारिश हो सकती है, जिससे सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा होने का खतरा रहेगा। मौसम विभाग के अनुसार बिहार में मानसून सामान्य रूप से 15 जून के आसपास पहुंचता है, लेकिन इस बार इसके 8 से 10 जून के बीच आने की संभावना जताई जा रही है। वहीं दक्षिण-पश्चिम मानसून के 26 मई तक केरल पहुंचने के संकेत मिले हैं। हालांकि मानसून के जल्दी आने के बावजूद पर्याप्त बारिश होने की संभावना कम मानी जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस वर्ष बिहार में सामान्य से लगभग 20 प्रतिशत कम वर्षा हो सकती है। राज्य में औसतन 992.2 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार यह आंकड़ा काफी नीचे जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर के विषुवतीय क्षेत्र में समुद्री जल का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसी कारण अल नीनो और सुपर अल नीनो जैसी स्थिति बनने की संभावना बढ़ गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से दो डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, तब उसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। यह स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है, लेकिन जब बनती है तो दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित करती है। अल नीनो के कारण प्रशांत महासागर से आने वाली गर्म हवाएं हिंद महासागर और अरब सागर से भारत की ओर आने वाली ठंडी और नम हवाओं को रोक देती हैं। यही हवाएं मानसून के दौरान बारिश कराती हैं। जब इन हवाओं का प्रवाह कमजोर पड़ता है तो मानसून भी कमजोर हो जाता है और वर्षा कम होती है। बिहार में मानसून की शुरुआत बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाओं के कारण होती है, लेकिन अल नीनो की स्थिति में ये हवाएं पर्याप्त रूप से आगे नहीं बढ़ पातीं। इसका सीधा असर राज्य में बारिश पर पड़ता है। अमेरिकी मौसम एजेंसी “राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन” के अनुसार मई से जुलाई के बीच सुपर अल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत है। वहीं दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत बताई गई है। एजेंसी ने यह भी कहा है कि इसके मजबूत या अत्यधिक मजबूत रहने की संभावना लगभग 67 प्रतिशत है। इससे हीटवेव, सूखा और कमजोर मानसून की आशंका और अधिक बढ़ गई है। बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जा रही है। राज्य की खेती काफी हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर करती है। इस वर्ष सर्दियों में भी सामान्य से कम बारिश हुई थी, जिससे गेहूं की फसल प्रभावित हुई। इसके बाद फरवरी से अप्रैल के बीच हुई बेमौसम बारिश ने किसानों को और नुकसान पहुंचाया। अब किसानों की उम्मीदें मानसून पर टिकी हुई हैं, क्योंकि धान की खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर करती है। यदि बारिश कम हुई तो राज्य में सूखे की स्थिति बन सकती है और कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। मौसम वैज्ञानिकों ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान परिस्थितियां 1966-67 जैसी नहीं हैं, जब बिहार में भयंकर सूखे और अनाज संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उस समय अनाज उत्पादन में भारी गिरावट आई थी, लेकिन आज बिहार धान और गेहूं उत्पादन में देश के प्रमुख राज्यों में शामिल है। मक्का उत्पादन में भी बिहार देश में तीसरे स्थान पर आता है। राज्य और देश दोनों के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है, इसलिए बड़े पैमाने पर भुखमरी जैसी स्थिति बनने की संभावना कम मानी जा रही है।

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