अमेरिका–ईरान समझौते की ओर बढ़ते कदम, युद्धविराम से पहले कूटनीति तेज

  • मध्यस्थ देशों की सक्रिय भूमिका, परमाणु मुद्दे और तेल निर्यात पर जारी बातचीत
  • नाकेबंदी से ईरान पर दबाव, वैश्विक तेल बाजार और पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। 21 अप्रैल को समाप्त हो रहे युद्धविराम से पहले दोनों देशों के बीच बातचीत निर्णायक दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है। हालांकि अभी भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्ष समझौते के करीब बताए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बैकचैनल संपर्क लगातार जारी है और मसौदा प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर हाल ही में तेहरान पहुंचे, जहां उन्होंने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात कर अमेरिकी पक्ष का संदेश साझा किया। इस बीच अमेरिकी नेतृत्व भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कई वरिष्ठ अधिकारी वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो युद्धविराम की अवधि बढ़ाई जा सकती है, हालांकि इस पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य में नौसैनिक नाकेबंदी को कड़ा कर दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि पिछले 48 घंटों में कोई भी जहाज ईरानी बंदरगाहों तक नहीं पहुंच पाया और नौ जहाजों को वापस लौटना पड़ा। इस नाकेबंदी का सीधा असर ईरान के तेल निर्यात पर पड़ रहा है, जो उसकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है। ईरान प्रतिदिन लगभग 15 लाख बैरल तेल निर्यात करता है, जिससे उसे बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। लेकिन नाकेबंदी के कारण इस आय में कमी आने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबी चली तो ईरान को तेल उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा। दूसरी ओर, ईरान ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी नाकेबंदी जारी रही तो वह लाल सागर, ओमान सागर और पर्शियन गल्फ में समुद्री व्यापार को बाधित कर सकता है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी दिखाई दे रहा है। कूटनीतिक प्रयासों के सकारात्मक संकेतों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही एशियाई शेयर बाजारों में भी तेजी देखने को मिली है, जो निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का एक अन्य पहलू इजराइल और लेबनान के बीच तनाव है। इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में कई ठिकानों पर हमले किए हैं, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष दूत ने इजराइल पर नागरिक क्षेत्रों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है और तत्काल कार्रवाई रोकने की मांग की है। इस बीच अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि यदि ईरान समझौते के लिए तैयार नहीं होता है तो नाकेबंदी को लंबे समय तक जारी रखा जा सकता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि आर्थिक दबाव के जरिए ईरान को वार्ता के लिए मजबूर किया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम वैश्विक भू-राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की संभावना बन रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय तनाव और संघर्ष भी बढ़ रहे हैं। 21 अप्रैल से पहले अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं या क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है।