August 25, 2026

पूर्व आईपीएस शिवदीप लांडे ने बनाई पार्टी, हिंद सेना रखा नाम, विधानसभा लड़ेंगे

पटना। बिहार की राजनीति में एक नया चेहरा कदम रख चुका है। पूर्व आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करते हुए ‘हिंद सेना’ नाम से नई पार्टी बनाई है। विधानसभा चुनाव से महज सात महीने पहले उनकी यह घोषणा राज्य की सियासी सरगर्मियों को और तेज कर रही है।
पार्टी का उद्देश्य और पहचान
शिवदीप लांडे ने अपनी पार्टी का उद्देश्य साफ किया है कि यह जात-पात, धर्म और वोट बैंक की राजनीति से हटकर एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था देने की कोशिश करेगी। उन्होंने बताया कि ‘हिंद सेना’ का नाम उन्होंने इसलिए रखा क्योंकि उनके खून के हर कतरे में हिंद है। पार्टी के चुनाव चिह्न के रूप में खाकी पृष्ठभूमि पर त्रिपुंड का प्रतीक रखा गया है, जो अनुशासन और संस्कृति का प्रतीक माना जा रहा है।
विधानसभा चुनाव में उतरने का एलान
लांडे ने पटना में आयोजित प्रेस वार्ता में यह स्पष्ट किया कि वे और उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में पूरी सक्रियता से भाग लेंगे। उन्होंने युवाओं को खासतौर पर आमंत्रित किया कि जो भी बिहार में बदलाव चाहते हैं, वे ‘हिंद सेना’ से जुड़ें। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई राजनीतिक दलों ने उन्हें राज्यसभा भेजने, मंत्री पद देने और यहां तक कि मुख्यमंत्री चेहरा बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने स्वतंत्र रूप से राजनीति में उतरने का रास्ता चुना।
इस्तीफे के बाद राजनीति में एंट्री
शिवदीप लांडे ने 19 सितंबर 2024 को आईपीएस सेवा से इस्तीफा दिया था। इस्तीफे के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि वे राजनीति में शामिल हो सकते हैं। शुरुआत में उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन 13 जनवरी 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दी और गृह विभाग ने 14 जनवरी को अधिसूचना जारी की।
लोकप्रियता और प्रशासनिक छवि
महाराष्ट्र के मूल निवासी शिवदीप लांडे बिहार में अपनी सख्त कार्यशैली और युवाओं में लोकप्रियता के लिए जाने जाते हैं। वे 2006 बैच के आईपीएस अधिकारी थे और आखिरी बार पूर्णिया में आईजी के रूप में कार्यरत थे। इस्तीफे से पहले उन्हें मुख्यालय बुला लिया गया था और आईजी प्रशिक्षण की जिम्मेदारी दी गई थी।
बिहार की राजनीति में नया समीकरण
लांडे की ‘हिंद सेना’ पार्टी के आने से बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण बन सकता है। जहां एक तरफ वे युवाओं और साफ छवि की राजनीति की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थापित दलों के लिए यह एक नई चुनौती बन सकती है। अब देखना होगा कि उनकी पार्टी आने वाले महीनों में कितनी पकड़ बना पाती है।

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